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Friday, 19 August 2011

मांस नोचने में अब छा रहे है लोग



आँखों देखी मक्खी खा रहे है लोग
जान बूझके गर्क में जा रहे है लोग
शर्म-लिहाज़ पर बहस करने वाले
बेशर्मी का बिगुल बजा रहे है लोग
हमाम में नंगे होने की बातें छोडो
अब तो खुले में ही नहा रहे है लोग
चील और गिद्द भी हुवे खौफजदा है
मांस नोचने में अब छा रहे है लोग
राम नाम जपना पराया मॉल अपना
गीत एक ही सूर में गा रहे है लोग
कर ली है रिश्तेदारी झूठ से बेचैन
सच्चाई से भी जी चुरा रहे है लोग

अब जो कहते है ये जंग नही वे उल्लू के पट्ठे है



आज जो अन्ना के संग नही है वे उल्लू के पट्ठे है
जिनमे देशभक्ति का रंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
भ्रसटाचार नही मिट सकता सोचने वालों सुन लो
जो इस बदलाव से दंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
दुनिया भर में धूम मची है अन्ना जी के नाम की
सुन फड़का जिनका अंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
रिस्पतखोरो के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर
जिसके भी मन में उंमग नही वे उल्लू के पट्ठे है
यह सौ फीसदी आज़ादी की दूसरी लड़ाई है बेचैन
अब जो कहते है ये जंग नही वे उल्लू के पट्ठे है

Tuesday, 9 August 2011

उन दिनों तुम अपने ज़ज्बात बदल सकते थे



तुमने चाहा ही नही हालात बदल सकते थे
अपनी बर्बादी की हम हर बात बदल सकते थे

आदमी कैसा हूँ मैं,मुझको समझते तो सही
मेरे बारे में तेरे ख्यालात बदल सकते थे
मेरे माथे पे मेरी कौम नही लिख रखी
साथ तुम देते हो हम ज़ात बदल सकते थे
जीना मुश्किल था अगर साथ इस दुनिया में
मर के हम तुम अपनी कायनात बदल सकते थे
मुझ पर इलज़ाम लगे जब जमाने भर के
उन दिनों तुम अपने ज़ज्बात बदल सकते थे
माफ़ हम करके तुम्हे, सीने से लगा लेते
पास आकर अपने वाक्यात बदल सकते थे
अपने बेचैन से तुम बात करते तो सही
हम तेरी आँखों की बरसात बदल सकते थे

तेरे गेसू मेरी किस्मत दोनों उलझे-उलझे है


मत पूछो  किसलिए आबे-जम पर लिखता हूँ
इक गजल रोजाना अपने गम पर लिखता हूँ
एक रोज़ तो जान जाऊंगा खारापन अश्को का
यही सोचकर मैं चश्मे-पुरनम पर लिखता हूँ
तेरे गेसू मेरी किस्मत दोनों उलझे-उलझे है
मैं इसीलिए तो जुल्फे- बरहम पर लिखता हूँ
दिल में सुलगे शोलो की रंजिस का राज यही
रोज़ सुबह अशआर मैं शबनम पर लिखता हूँ
ना सीखा ना फितरत में चोरी शामिल है बेचैन
जो भी लिखना होता है अपने दम पर लिखता हूँ

क्या खिला दिया साजन ने निखर गये हो



सरगोशी हो रही है तुम जिधर गये हो
क्या खिला दिया साजन ने निखर गये हो
कुछ नही हासिल,वक्त की दलील देने से
क्यू  नही मानते जुबां से मुकर गया हो
घुंघट की आड़ में रहकर चंद रोज़ सांवली
हुश्न की कसोटी पर खरे उतर गये हो
चाल में बर्क है तो तब्बसुम है लबो पर
निकाह के बाद अंदाजों से भर गये हो
पहरों बीतते थे जिन हमनशीनो के साथ
उनके भी घर मुलाकाते मुख्तसर गये हो
हर कहानी का अंजाम एक जैसा नही होता
किसलिए शहर में हुवे हादसे से डर गये हो
छोड़ दिया बेचैन उसने देखना कनखियों से
जब से तुम इलज़ाम अपने सिर धर गये हो

Monday, 8 August 2011

लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे


खूब झूमा अपने ख्वाब के साथ बैठ कर
आज पी भाई साहब के साथ बैठ कर
पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ
सीखा बहुत कुछ नकाब के साथ बैठ कर
बहुत कम लोगो को मालूम था आज
फंस गया सवाल जवाब के साथ बैठ कर
लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे
महसूस किया ये सब गुलाब के साथ बैठ कर
ऐसी कोई तीर मारने वाली बात नही बेचैन
देख लिया हमने जनाब के साथ बैठ कर

खूब झूमा अपने ख्वाब के साथ बैठ कर
आज पी भाई साहब के साथ बैठ कर
पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ
सीखा बहुत कुछ नकाब के साथ बैठ कर
बहुत कम लोगो को मालूम था आज
फंस गया सवाल जवाब के साथ बैठ कर
लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे
महसूस किया ये सब गुलाब के साथ बैठ कर
ऐसी कोई तीर मारने वाली बात नही बेचैन
देख लिया हमने जनाब के साथ बैठ कर

हो जाती बरसात तो ना सुलगता बेचैन



कौन बैठेगा भला आकर मुझ ठूठ के नीचे
ना छाया देता हूँ ना असर बहारो का है
गला घोंट दू यादो का नया घर बसा लू
मुझसे ना होगा ये काम तो गदारो का है
वो तो गम की कैद में हूँ वरना बता देता
क्या मतलब आजकल तेरे इशारो का है
हर काम में दिखाते है जो लोग कलाकारी
आज जमाना यारो उन कलाकारों का है
हो जाती बरसात तो ना सुलगता बेचैन
दिल जलाने में हाथ हल्की फुहारों का है

Sunday, 7 August 2011

मित्रता दिवस पर जब यादों के जंगल में गया तो ये रचना तैयार हुई



कुछ साले कुछ कुते कुछ कमीने याद आये
दोस्ती के नाम पर कुछ नगीने याद आये
बयाँ नही कर सकता मैं अहसास जिनका
मस्ती बिखेरते मुझे वो महीने याद आये
खुदा कितना साथ देता है नाखुदाओ का
जब महोब्बत के हमको सफिने याद आये
इश्क में उन दिनों की मेहनत तौबा तौबा
कैसे -कैसे निकले वो पसीने याद आये
सर चढ़कर बोलती थी नौजवानी मगर
बदमाशियो के हमको करीने याद आये
जिक्र मयकशी का छिड़ा तो सुन बेचैन
कोलिज़ में बैठकर जाम पीने याद आये

जब से हुवे बदतमीज़ थोडा



हम मुद्तो रहे अपनी हद में
ना बढ़ पाए रुतबा-ए- कद में
जब से हुवे बदतमीज़  थोडा
नाम आ गया बडो की जद में
आज कुर्सी की बात ना करो
अजीब सी ताकत है पद में
खूब पछताए इक उम्र के बाद
जो चूर थे कभी अपने मद में
राज बेचैन होने का जान जाओगे
 झांक कर देखो  मुझ निखद में



Saturday, 6 August 2011

ऊँगली पर गिनो जब यार अपने बेचैन



ये महोब्बत ये अपनापं बरकरार रखना
दोस्त सदा दिल में यूही प्यार रखना
आभागा हूँ मुझपे आ सकती है मुश्किल
देने को मेरा साथ खुद को तैयार रखना
सच कहू तो ज़माना मेरे पीछे पड़ा है
चापलूसों से खुद को खबरदार रखना
खबर देश प्रदेश की लगती रहेगी
घर में कोई बांधकर अखबार रखना
सुना है देश छोड़ कर जा रहे हो तुम
हो सके तो ख्याल मेरा उस पार रखना
ऊँगली पर गिनो जब यार अपने बेचैन
हो सके तो नाम मेरा शुमार रखना

कुछ शेर दोस्ती के लिए

सिवाय आपसे  जैसे यारों के मेरे पास क्या है
आपने ही तो बताया यारी का अहसास क्या है
खून के  रिश्ते तो आज ज़हर उगलने लगे है
कहो दोस्ती से बढ़कर रिश्ता  खास क्या है
...........................................................
जो करते नही खिलवाड़ दोस्ती के साथ
उन यारो को लेता हूँ संजीदगी के साथ
धोखा फरेब और मक्कारी के युग में  
कैसे कर लू दोस्ती हर किसी के साथ
............................................................
धडकनों को आँखों को, ना किसी का इंतज़ार हुआ
उसकी बे-वफाई के बाद, ना कोई मेरा यार हुआ
चाह कर भी ना बन सका मन का मीत कोई  
कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ
.............................................................कुछ शेर दोस्ती के लिए 
बनके लहू जो यार रगों में दौड़ते है
वो जिंदगी में इक मकसद जोड़ते है
शक में डूब जाती है उनकी हर बात  
जो लोग दोस्ती में भरोसा तोड़ते है



कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ

धडकनों को आँखों को, ना किसी का इंतज़ार हुआ
उसकी बे-वफाई के बाद, ना कोई मेरा यार हुआ
चाह कर भी ना बन सका मन का मीत कोई
कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ

Friday, 5 August 2011

सफर की शुरुआत ही क्यू होती है



घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
बात में कितने तौला  मोती है
सोच समझ कर बताओ यारो
उमर ख़ुशी की किसलिए छोटी है
ता-उमर चलके भी दो गज जमी
सफर की शुरुआत ही क्यू होती है
उसकी यादें ना हुई गजब हो गया
आते ही मन का चैन क्यू खोती है
हजारों रिश्तो के आगे भी बेचैन
माँ किसलिए नम्बर वन होती है

उम्र भर का दे जाते है इंतजार कुछ लोग


क्यूं होते है इस कदर होशियार कुछ लोग
समझ लेते है दूसरो को बेकार कुछ लोग
कामयाबी सबका जन्मसिद्ध अधिकार है
क्यूं नही करते है सोच विचार कुछ लोग
जब देखो फूलों से दिल लगाते फिरते है
क्यूं नही चाहते उल्फत खार से कुछ लोग
मैंने देखा है औरों पर तंज़ कसने वालों को
नही करते है खुद को शर्मसार कुछ लोग
खाकर झूठी-सच्ची कसमे इश्क में अक्सर
उम्र भर का दे जाते है इंतजार कुछ लोग
जिनका मजबूरी में बोझ उठाना पड़ता है
किसलिए होते है रिश्तों पर भार कुछ लोग
नही समझ पाया हूँ मैं आज तक बेचैन
क्यूं करते है मतलब से व्यवहार कुछ लोग

Tuesday, 2 August 2011

धडकन सा मगर तू मेरी जान ही रहा

मकी ना बना दिल का मेहमान ही रहा
दोस्त जिंदगी पर सदा अहसान ही रहा
टपकता रहा ता-उम्र लहू मेरी आँखों से
लेकिन तू तमाशाइओ सा हैरान ही रहा
बेशक चढ़ गया हो परवान दुश्मनी का
धडकन सा मगर तू मेरी जान ही रहा
ना रास आया जमीं पर जब कोई नजारा
दूर तक नजर दौड़ाने को आसमान ही रहा
कुछ यूं मिला सिला इंतजार का हमको
मरते दम तक आँखों में तूफ़ान ही रहा
जान गया जब बागवा बे-वफाई मौसम की
बहारो के आने पर भी परेशान ही रहा
बेचैन रुत की मानिंद दुनिया बदल गई
अपना राहे-वफा पर चलना ईमान ही रहा

Monday, 1 August 2011

तू शहर से क्या गई, मेरी तो जान चली गई

ठहरी आँखों की कसम दिल की शान चली गई

तू शहर से क्या गई, मेरी तो जान चली गई

दौड़ता है लहू रगों में फकत कहने भर को

जिसे जिंदगी कहते है वो जुबान चली गई

एक बोझ बनकर वो धरती पे रह गया

जिस शख्स की ज़माने में पहचान चली गई

अपनी तस्वीर के बहाने मेरी तन्हाईयो को

देकर सज़ा ए हिज्र का सामान चली गई

पैगाम लेकर आई थी, जो लहर साहिल का

उठाकर मेरी जिंदगी में तूफ़ान चली गई

जाते ही खत लिखने का करके वादा बेचैन

खाकर झूठी कसम वो बेईमान चली गई

Sunday, 31 July 2011

मैं पीता नहीं हूँ मुझे पिलाते है लोग

मेरे पहलु में जाने क्यों आते है लोग
मैं पीता नहीं हूँ मुझे पिलाते है लोग
निकालने को अपना कोई भी काम
बोतले लेकर पहुच जाते है लोग
इससे पहले की खोलू मैं अपना मुह
मुझसे पहले खुदा की कसम खाते है लोग
मन से दिल से मैं सच्चा हूँ दोस्तों
फिर भी मुझे झूठा ठहराते है लोग
जो कहता सरेआम खुद को बेचैन
उसी से चैन की उम्मीद जताते है लोग

नशे की मां भी मर गई, अब क्यों ना सोया जाये

जो पी थी वो उतर गई, अब क्यों ना सोया जाये
नशे की मां भी मर गई, अब क्यों ना सोया जाये
मकसद हो ही गया पूरा पलके झिलमिलाने का
याद में आँख भी भर गई अब क्यों ना सोया जाये
देख लेना जफा से चिड उसे ता-उम्र रहेगी दोस्त
मेरी बातों से वो डर गई अब क्यों ना सोया जाये
जता दू शुक्रिया पर्वत दिगारे दो जहाँ वाले का
मेरी हरकते भी संवर गई अब क्यों ना सोया जाये
यही थी आरजू कब से लो अब वो पूरी हो ही गई
मुझे वो बेचैन भी कर गई अब क्यों ना सोया जाये

इश्क रोशन है यारों सितमगर के बाइस



वो मुरीद है मेरा, मेरे हुनर के बाइस
लोग शैदा होते है वरना जर के बाइस
कब का भूल गया होता घर गाँव का लेकिन
इक पहचान बाकि है सूखे शजर के बाइस
मैं सह नहीं सकता, नशा नींद का मगर
जाग सकता हूँ, बज्मे-सुखनवर के बाइस
कनखियों से मुझे घूर कर क्या देखा उसने
दिल हो गया बिस्मिल तेगे-नजर के बाइस
जर्फ़ वालों की कसौटी से निकला है जूमला
इश्क रोशन है यारों सितमगर के बाइस
बाप होने का हक अदा, यूं किया उसने
हो गया नीलाम लख्ते-जिगर के बाइस
आवारगी ने तो कोई कमी ना छोड़ी बेचैन
मगर ना हो सके आवारा घर के बाइस

मुरीद= प्रशंसक
बाइस=कारण
शैदा =आशिक
शजर = पेड़
बज्मे-सुखनवर= कवि सम्मेलन
जर्फ़=श्रेष्ठ,
कसौटी =अनुभव
लख्ते-जिगर= दिल का टुकड़ा ,
बिस्मिल= घायल
तेगे-नजर= निगाहों की तलवार