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Friday, 16 December 2011

देखा जब से तुझे हंसते शमा सा पिंघलता हूँ

तेरी तस्वीर तकता हूँ और करवट बदलता हूँ
देखा जब से तुझे हंसते शमा सा पिंघलता हूँ

इससे और ज्यादा क्या कहू दीवानगी अपनी
तुम्हारा नाम ले लेकर मैं नींद में चलता हूँ

याद आती है जब तुमको न पाने की मजबूरी
कभी रोता हूँ सिसकी ले,कभी हाथ मलता हूँ

शहर में लौटने की तुमने जबसे बात बताई है
कैसी होगी मुलाक़ात सोचकर मैं मचलता हूँ

सदा यूं खाद पानी देते रहना प्यार की मुझको
तेरे दिल में भी मैं अगर पौधे सा पलता हूँ

बात कर लेते हो जिस दिन अपने बेचैन से तुम
मैं उस दिन बच्चों की तरह सारा दिन उछलता हूँ




वो चाँद के जैसे शरमाता रहे

हंसकर मेरे ख़्वाबों में आता रहे
वो ता-उम्र यूं ही मुस्कुराता रहे

वो रहम मुझ पर ना खाए बेशक
मुफलिसों पर तरस खाता रहे

मजा आ रहा हैं प्यार करने का
वो मुझे रोजाना ही सताता रहे

देखकर लोग यूं ही तारीफे करे
वो चाँद के जैसे शरमाता रहे

हर जन्म में तुम्हारा बेचैन
वो महबूब ही विधाता रहे

इसीलिए शायद साफ़ दिल कहते है उसे

वो जवाब के साथ सवालात छोड़ देता हैं
सोचते ही रहो ऐसे ज़ज्बात छोड़ देता हैं

जाने कहाँ से लाया है महोब्बत की अदा
बिगाड़कर दिल के हालात छोड़ देता हैं

उसके सिवा तो खुदा ही जानता है उसे
काम की अधूरी हर बात छोड़ देता हैं

इसीलिए शायद साफ़ दिल कहते है उसे
कडवे विचारों को हाथों हाथ छोड़ देता हैं

सांप से भी खतरनाक है वो शख्स बेचैन
जो केचुली की तरह औकात छोड़ देता है

Thursday, 15 December 2011

मुझसे मेरी जान यूं भागा मत कर

मुझसे मेरी जान यूं भागा मत कर
तेरे हक में उठती हुई दुआ हूँ मैं

टकटकी लगाकर देख तस्वीर मेरी
फिर बताइयेगा की कैसा हूँ मैं

अब जीते जी कैसे छुड़ाओगे पीछा
लहू बनकर तेरी रगों में रवां हूँ

ख़ुशी में बेशक मुझे याद ना कर
मगर गम की तेरे लिए दवा हूँ मैं

बेचैनी और शकुन दोनों मिलेंगे
आंसू का एक ऐसा कतरा हूँ मैं

बेवजह बेचैन मुझपर शक ना कर
रो पडूंगा बहुत ज्यादा दिलजला हूँ

Wednesday, 14 December 2011

हर शख्स मुझको अब दीवाना कहता है

वो हवा बन करके सांसो में यूं बहता है
खुशबू का झोंका जैसे गुलों में रहता है

मेरी हरकतों में जाने ऐसा क्या हो गया
हर शख्स मुझको अब दीवाना कहता है

रखी गई हो जिस पर झूठ की बुनियाद
महोब्बत में वो किला बनते ही ढहता है

अबतक इसीलिए शायद धडक रहा है दिल
वो लहू बनकर रगों में हर वक्त बहता हैं

अपनापन तो उससे हो गया है बेचैन
बेगानों के नखरो को भला कौन सहता है

Tuesday, 13 December 2011

ज़ज्बात का खरगोश निशाना था उसका

उम्र भर के साथ को तो गोली मारो
वो हमसे दो दिन में ही खफा हो गये

मुद्दत से भर रहा था जिनमे में रंग
झटके में ख्वाब सारे सफा हो गये

ज़ज्बात का खरगोश निशाना था उसका
कमबख्त करके शिकार दफा हो गये

यह खूब रही इश्क ने राख कर डाला
जलाकर मुझे कमबख्त धुंआ हो गये

गम का जश्न मना बोतल खोल ले बेचैन
सब वादे महोब्बत के जफा होग गये

तुमको पाया तो लगा इंतज़ार अच्छा था

इकरार से सौ गुना इनकार अच्छा था
तुमको पाया तो लगा इंतज़ार अच्छा था

तारे गिनने का क्या काम सौंपा तुने इश्क
आशिक बनने से पहले बेकार अच्छा था

छोड़ दिया उसने मेरा हाल चाल पूछना
ठीक होने से तो मैं बीमार अच्छा था

अब बेचैन रहता हूँ जबसे जवानी आई है
पहले यारों बचपन वाला करार अच्छा था

दोस्ती के नाते सही हंसकर तो बोलते थे
इस बेरुखी से तो उसका प्यार अच्छा था





Monday, 12 December 2011

उसने छोड़ने की धमकी दी है

उसने छोड़ने की धमकी दी है
दिल को तोड़ने की धमकी दी है

मेरी रातें तन्हाइयों के साथ
फिर से जोड़ने की धमकी दी है

कशमकश में हूँ क्या करूं उसने
गुमनामी ओढने की धमकी दी है

वो जनता है मैं चल नही सकता
उसने दौड़ने की धमकी दी है

करके बहाना जमाने का बेचैन
दिल को मोड़ने की धमकी दी है

होश वालों से पूछो उन्हें कब शर्म आती है

शौक नही है पीने का मजबूरी पिलाती है
मूड़ बनता है तब जब उसकी याद आती है

दर्दे-दिल बर्दाश्त करना सबके बस का नही
इसे वो समझेगा लोहे की जिसकी छाती है

दगा देता है जब यार प्यार और रिश्तेदार
दवा के भेष में शराब ही साथ निभाती है

उस दिन तो दोस्तों हर हाल में जाम लगाता हूँ
जब लड़ाई के अंदेशे से बाई आँख फडफडाती है

खूब लिहाज़ बरतता हूँ पीने के बाद बेचैन
होश वालों से पूछो उन्हें कब शर्म आती है


अच्छे अच्छे तन्हाई के हवाले किए है

इश्क तूने खूब गडबड घोटाले किए है
अच्छे अच्छे तन्हाई के हवाले किए है

कर दिया साबित पल में दिल को बच्चा
प्यार ने पैदा ऐसे ऐसे दिलवाले किए है

जां छिडकने को मजबूर हुवे है परवाने
शमा ने जब भी दोस्तों उजाले किए है

सरे बज्म की है जिसने चुगली किसी की
उसकी जुबान पर वक्त ने छाले किए है

बढ़ी है जिन धडकनों की रफ्तार बेचैन
उस दिल ने काम सबसे ही निराले किए है

Sunday, 11 December 2011

अहसास के पलों की हिफाजत करेंगे हम

जिंदगी भर आपकी इबादत करेंगे हम
अहसास के पलों की हिफाजत करेंगे हम

हरगिज़ ना आंसू आने देंगे आपको कभी
आयेंगे तो पीने की आदत करेंगे हम

होगा वजूद दुनिया में बेशक खुदाओं का
तुम मिल गये हो सबकी खिलाफत करेंगे हम

जीते जी आम होगा ना रिश्ता रूहानियत
लोगों से जिक्र करके क्यूं आफत करेंगे हम

कभी आजमाके देखना अपने बेचैन को
चाहोगे जितना उतनी महोब्बत करेंगे हम




नही समझ पाया हूँ कमबख्त को मैं

वो बारहा जिक्र जमाने का उठाते है
क्या हमको लोग समझ नही आते है

खुदा जाने  वो कैसा दिमाग रखते है
जहाँ से शुरू होते है वही आ जाते है

कहते है वो मेरी खुशियों में खुश है
मगर मिलते ही मौक़ा खूब सताते है

करते है जब वो घुमा फिराकर बात
अपने तो दोस्तों तोते उड़ जाते है

नही समझ पाया हूँ कमबख्त को मैं
अक्सर बेचैन करके प्यार जताते है

इश्क दरिया-ए-अंगार है सम्भल कर मेरी जान

ये अहसास का व्यपार है सम्भल कर मेरी जान
इश्क दरिया-ए-अंगार है सम्भल कर मेरी जान

हम मर्दों का क्या है हम तो होते है अफलातून
औरतों पर शक हजार है सम्भल कर मेरी जान

अच्छा ही होगा अपनी-अपनी हदें बाँट ले हम
दोनों के पीछे परिवार है सम्भल कर मेरी जान

तुम बेशक कर लो दिल की सौदेबाजी मुझसे
अगर खुद पर एतबार है, सम्भल कर मेरी जान

नही होता जिनके दिल पर दिमाग की पहरेदारी
बेचैन वो लोग शर्मसार है सम्भलकर मेरी जान

Saturday, 10 December 2011

मेरी बुढ़ी भी पठा कहती है



"आज तुमको गुलाब देता है "
 इक महकता ख्वाब देता हूँ

लो देख लो अपना चेहरा
मैं आँखे पुर आब देता हूँ

मुझे हिज्र कहते वस्ल धारी
जब हालत इज़्तिराब देता हूँ

हंसी है जब मुझे देख तन्हाई
बदले में उसको शराब देता हूँ

ना बुरा मानिएगा आदत का
मैं तो यूं ही जवाब देता हूँ

मेरी बुढ़ी भी पठा कहती है
जब बालों में हिजाब देता हूँ

बेचैन समझ माफ़ कर देना
गर मैं गजले खराब देता हूँ

वो भी शादीशुदा निकली मेरे भी दो साले है

खुदा जाने क्या होगा बड़े गडबड घोटाले है
वो भी शादीशुदा निकली मेरे भी दो साले है

उम्र के इस दोराहे पर ख़ाक इकरार कर ले हम
ज़िम्मेदारी के दोनों ने गले में पट्टे डाले है

गिरे है सर के बल यारों अब तक तो वो लोग
बुढ़ापे में आशिकी के जिसने भी पर निकाले है

ज़ुल्फ़ को रंग देने से रंगने से कभी उम्र नही घटती
अलग महफ़िल में दीखते है जिनके बाल काले है

बुरा मत मानना मेरे महबूब मेरे दोस्त
आज हम जैसो के कारण दोस्ती में उजाले है

कही भी दिल लगा लूं मैं झट से टांग अदा देंगे
एक बीवी और दो बच्चे मेरे ऐसे घरवाले है

उन्हें बेचैन मत करना जो मुझको चाहते है मौला
बड़ी मुश्किल से यारों ने एक दो यार सम्भाले है


Friday, 9 December 2011

सबके टकराते है बरतन ना झूठ बोलिए

चेहरा है मन का दरपन ना झूठ बोलिए
तेज़ हो जाएगी धडकन ना झूठ बोलिए

मियाँ-बीवी की तकरार पे शर्मिंदगी कैसी
सबके टकराते है बरतन ना झूठ बोलिए

मुमकिन नही जो बात उसका वादा ना करो
कर दोगे सब कुछ अरपन ना झूठ बोलिए

जब देखते है आप मुझे मुस्कुराकर हुजुर
बढती है दिल की तडफन ना झूठ बोलिए


बेचैन जमाने में पूछ लीजिये किसी से भी
याद आता है सबको बचपन ना झूठ बोलिए

अहसास की औकात हो पर रूबरू नही

 चाहता हूँ मुलाकात हो पर रूबरू नही
रोजाना उनसे बात हो पर रूबरू नही

इक दूजे को समझाने और कुछ बताने में
चाहे जख्मी ख्यालात हो पर रूबरू नही

बनकर भ्रम उनकी मैं रूह से चिपक जाऊ
इक ऐसी करामात हो पर रूबरू नही

हम जिम्मेदारियों को भी हरगिज़ दगा ना दे
अहसास की औकात हो पर रूबरू नही

वो प्यार करे जिस भी पल अपने आप से
मेरे हिस्से भी खैरात हो पर रूबरू नही

होकर बेचैन मुझको महसूस वो करें
uske दिल पे  मेरे हाथ हो पर रूबरू नही 

Wednesday, 7 December 2011

उनसे कोई ख्वाइश अब और ना करूंगा

अहसास की नुमाइश अब और ना करूंगा
उनसे कोई ख्वाइश अब और ना करूंगा

उसने भी थोडा बहुत महसूस किया होगा
समझाने की गुंजाइश अब और ना करूंगा

पहले ही उसने मुझे बहुत कुछ दिया है
मैं कोई भी फरमाइश अब और ना करूंगा

जगह बना ली है उसने अब मेरे दिल में
फालतू की सताइश अब और ना करूंगा

वो कितने ही बेचैन होकर करे मुझसे बात
ज़ज्बात की पैमाइश अब और ना करूंगा
सताइश--प्रशंसा

सबके हिस्से में है भाई एक कमीना रिश्तेदार

बर्बादी की है परछाई एक कमीना रिश्तेदार
सबके हिस्से में है भाई एक कमीना रिश्तेदार

गुड और शहद सी मिठास रखता है जुबां में
आदमी है या मिठाई एक कमीना रिश्तेदार

चुगली और साजिस का बनकर ख़ास हिस्सा
आएगा देने सफाई एक कमीना रिश्तेदार

खुश होकर महफ़िल में झुमने वालो सुन लो
बांटता फिरे है तन्हाई एक कमीना रिश्तेदार

घर का झगड़ा सुलझाएगा नही, देखेगा
है बहुत बड़ा तमाशाई एक कमीना रिश्तेदार

फंसकर ही समझोगे तुम बात को बेचैन
कितना बड़ा है कसाई एक कमीना रिश्तेदार

कुछेक रिश्तेदारों को तो वाकई छोड़ देता

वो बेशर्मी से आंचल की बात करते है
जिसको चुनरी तक भी नही ओढना आता

मार नही खाते फिर कभी दुनियादारी में
काश हमें झूठ का निम्बू निचोड़ना आता

कुछेक रिश्तेदारों को तो वाकई छोड़ देता
सचमुच मुझको अगर साथ छोड़ना आता

अफ़सोस कम हो जाता गरीबी का खुदा
मेरे नसीब को गर थोडा तेज़ दौड़ना आता

ना होता घाटा दुकानदारी में बेचैन
यारों के खातों गर हिसाब जोड़ना आता
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