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Saturday, 15 October 2011

वो आता हैं याद चाहे बुढ़ापे में आये


रूह से चिपक जाता हैं उतरता नहीं हैं
इश्कियां भूत जीते जी मरता नहीं हैं
कितना ही पुराना हो जख्मे-महोब्बत
पूरी तरह से यह कभी भरता नहीं हैं
लफ्जों से झलक जाता हैं हाले-दिल
चेहरा आइना हैं कभी मुकरता नहीं हैं
वो आता हैं याद चाहे बुढ़ापे में आये
यादों का नश्तर रहम करता नहीं हैं
हर आँख में हैं मौत का खौफ बेचैन
किसने कहा की वो कभी डरता नही हैं

1 comment:

chirag said...

shandaar behchain sahab