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Wednesday, 26 October 2011

बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे

दिल में किसी यारी का शोर ना हो तो अच्छा है
करम दोस्तों के अब और ना हो तो अच्छा है
ना सजे महफ़िलें और ना कही मैं शेर कहू
झूठी वाह-सुनने का दौर ना हो तो अच्छा है
झूठी है तो झूठ रहे होठों की मुस्कान मगर
धडकनों पे किसी का गौर ना हो तो अच्छा है
बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे
शबनम की कातिल भोर ना हो तो अच्छा है

देखा है परख कर  बेचैन , गैर-गैर ही निकले
अब दिल का कोई चितचोर ना हो तो अच्छा है

1 comment:

Riya said...

गैर-गैर ही निकले
अब दिल का कोई चितचोर ना हो तो अच्छा है....bahut acchha hai