Friends

Friday, 21 September 2012

जिंदगी ज़ुल्फ़ नही है जो फिर से संवर जाएगी

एक बार उलझी तो उलझती चली जाएगी
जिंदगी ज़ुल्फ़ नही है जो फिर से संवर जाएगी

सोच समझकर ही लीजिएगा हरेक फैंसला
सदा लिए बात कोई शर्मिंदा कर जाएगी

तुम बेशक कूच कर जाओ मेरी दिल से लेकिन
मैं देखता हूँ तुम्हारी याद किधर जायेगी

जब तलक आएगा तेरे होश को होश जान
तब तक मेरी याद खुशबू बनके बिखर जाएगी

बेचैन प्यार के सिवा कोई भी और जिक्र छेड़
दास्ताने इश्क सुन मेरी आँख भर जायेगी

कल वो फिर याद आयेंगे तो देखी जाएगी

चलो आज का काम तो चल गया शराब पीकर
कल वो फिर याद आयेंगे तो देखी जाएगी

सो जाऊंगा बिना खाए पिए नशे में पड़कर
रात को ख्वाब सतायेंगे तो देखी जाएगी

खो जाऊंगा उसकी यादों के बियाबान में
लोग उँगली उठाएंगे तो देखी जाएगी

उसको जी भर कर देखने की आरज़ू में
हम मिट भी अगर जायेंगे तो देखी जाएगी

मैं तो कभी जफा नही करूंगा बेचैन मगर
पर बेवफा कहलायेंगे तो देखी जाएगी



Wednesday, 19 September 2012

जी भर कर देखे बगैर मेरी प्रेम कहानी अधूरी है


मैं झूठा मेरी तडफ झूठी सच्ची तेरी मजबूरी है
हाँ समझ गया हूँ तेरी महोब्बत कितनी मीठी छूरी है

जिस रोज मेरी प्यास तुम्हारे होठों पर पपड़ी ला देगी
तब बताना सिवा प्यार के दुनिया में क्या पाना जरूरी है

बता कोरे ज़ज्बातों के दम पर कब तक दूं खुद को तसल्ली
जी भर कर देखे बगैर मेरी प्रेम कहानी अधूरी है

तुझे कसम है तेरे ही ज़ज्बातों की मुझसे आन मिलो
मुझको लेकर अगर तुम्हारा कोई भी सपना सिन्दूरी है

हम दोनों के बीच फसाद की वही तो असली जड़ है जान
हाँ  मेरे मन से तेरे मन की बेचैन जितनी दूरी है

Tuesday, 18 September 2012

मैं फायदा उठा रहा हूँ भोलेपन का कहते क्यूं नही

तुझे सोचकर दर्द बढ़ता है मेरे मन का कहते क्यूं नही
मैं हिस्सा बन गया हूँ तेरी उलझन का कहते क्यूं नही

जिंदगी सच बता वास्ता है तुझको तेरी ही पाकीजगी का
मैं तुझे चोर दिखता हूँ ना तेरे तन का कहते क्यूं नही

जो इल्जाम कल जमाना देगा तू आज ही दे दे तो अच्छा
मैं फायदा उठा रहा हूँ भोलेपन का कहते क्यूं नही

मेरी मुफलिसी-ओ- किरदार तेरे रुतबे आगे छोटे है
यही सबब तो है रोजाना की अनबन का कहते क्यूं नही

वैसे भी तो तुझको मर्द जात से सख्त नफरत है बेचैन
नही है भरोसा है तेरे चाल चलन का कहते क्यूं नही








Monday, 17 September 2012

तेरा ही तो इंतजार है पथराई आँखों में

तू अश्क बनकर रहता है डबडबाई आँखों में
तेरा ही तो इंतजार है पथराई आँखों में

तू मिले जिस रोज उस दिन झांक कर देख लेना
सुबक सुबक कर पड़ गई है कितनी काई आँखों में

इसलिए ज्यादा फिक्रमंद मैं आजकल रहने लगा हूँ
अपना घर बसा चुकी है जान तन्हाई आँखों में

तू करता तो है बात के साथ मुझ पर शक मगर
क्या लगती है तुझे कही से बेवफाई आँखों में

इससे जियादा तुझे और क्या कहू बेचैन
तडफती रहती है प्यार की सच्चाई आँखों में

Sunday, 16 September 2012

दिल जब महबूब के इशारों के बीच बैठा

आज मैं सच्चे कलमकारों के बीच बैठा ,,,
जज्बात में डूबे हुवे यारो के बीच बैठा

उम्मीदों से सौ गुना सफल हुआ आयोजन
शहर जब धुरंधर फनकारों के बीच बैठा ,,,

सभी को तो भा गया अंदाज़ कवि संगम का
दिल जब हमख्याल बंजारों के बीच बैठा ,,,,

लागू हो जाये देश में तो आ जाये बदलाव
दोस्तों आज ऐसे विचारों के बीच बैठा

हां बेचैन को भी उस वक्त चैन मिल गया
दिल जब महबूब के इशारों के बीच बैठा

Saturday, 15 September 2012

अगले जन्म में मुझे भी किसी जान बनाना दाता

जमाना औरत को हद से ज्यादा बेबस कहता है
मर्द के उस दर्द का क्या जिसे मन में सहता है

नजर अंदाज़ कर दी जाती है हर एक तकलीफ
आदमी की रूह से जब कभी भी आंसू बहता है

खासकर शादीशुदा लोगो की दिक्कत मत पूछो
जिनके ख्वाबो का किला कंवारेपन से ढहता है

माँ बहन बेटी ओ महबूबा को कितना ही प्यार दे
फिर भी बेचारे पर बेवफाई का दाग रहता है

अगले जन्म में मुझे भी किसी जान बनाना दाता
इस जन्म का कर्ज़ बेचैन चीख चीखकर कहता है


Friday, 14 September 2012

न जाने कौन पायेगा मुस्कुराहट तुम्हारी

हमें तो अक्सर मिलती है गुर्राहट तुम्हारी
न जाने कौन पायेगा मुस्कुराहट तुम्हारी

उफ़.जिस्म के पुर्जे पुर्जे की बेजोड़ नक्कासी
फिर ऊपर से जानलेवा खिलखिलाहट तुम्हारी

ये तेरे हुश्न की महक है या काला जादू
अंधे तलक पहचान लेते है आहट तुम्हारी

जब भी देखा है गुस्सा नाक पर देखा है
आखिर कब देख पायेंगे नरमाहट तुम्हारी

सच बता तो सही बेचैन ये क्या माजरा है
क्यूं बढ़ रही दिनों दिन छटपटाहट तुम्हारी

Thursday, 13 September 2012

वो जिंदा था तो तेरे नखरे नही सिमटे

वो जिंदा था तो तेरे नखरे नही सिमटे
अब रो उमर भर उस बदनसीब के लिए

वो प्यार में फरेब खाकर यूं कर गया कूच
छोटी पड़ गई थी दुनिया गरीब के लिए

शक्ल तो दूर आवाज़ तक न सुनाई देगी
अब रोजाना तरसो उस हबीब के लिए

तू मूंदकर आँखे जरा याद करके देख
वो सदा रोता था तेरे करीब के लिए

तू ही तो समझता था आबरू का दुश्मन
अब क्यूं बेचैन है मरहूम रकीब के लिए

Tuesday, 11 September 2012

किसलिए मेरे सांस लेने में तू खड़ी परेशानी करता है

दिल है की तुम्हारे वादों पर धडकने की नादानी करता है
एक तू है की तस्वीर तक देने में आनाकानी करता है

मेरे साथ मेरी महोब्बत का किस्सा अब होने भी दे खत्म
रोज बातें बनाकर मुझपे क्यूं झूठी मेहरबानी करता है

तुझसे नही चाहिए कोई भी जवाब मगर इतना सा बता दे
किसलिए मेरे सांस लेने में तू खड़ी परेशानी करता है

कुछ मत बोलियेगा तेरे चेहरे ने सब बोल दिया मेज़बान
हाँ मजबूरी में तू मेहमानों की चाय पानी करता है

ये मैं नही कहता हूँ तारीख में साफ़ साफ़ लिखा है बेचैन
वो पछताता है जो किसी के जज्बात से छेड़खानी करता है

Saturday, 8 September 2012

ये हीरा चाटकर मर जाऊ रब की कसम

ज़हर से बुझे हुवे तुम्हारे लब की कसम
ये हीरा चाटकर मर जाऊ रब की कसम

हुश्न-ए- बला आगे फीके पड़ गये शेर
हां मुझे मेरी शायरी के ढब की कसम

कुदरत की पहली नेमत है तेरा हुश्न
ये पेड़ पर्वत नदिया इन सब की कसम

तुझ पर कर सकता हूँ उम्र भर शायरी
उर्दू के उस्तादों की अदब की कसम

तू जिसे देखे हंसकर बेचैन हो जाये
बेहद खूब है जो उसी गजब की कसम

अल्लाह मेरी जानम को गुलफाम कर दो

मैंने कब कहा चाहत अपनी आम कर दो
ये रूतबा-ओ-आबरू मेरे नाम कर दो

तुम्हारी सोच ही तुम्हारी दुश्मन बनी है
बस ढंग से तुम इसका एहतराम कर दो

मैं दिल में नही तो दिमाग में तो रहूँगा
बस अपनी नफरत का मुझको गुलाम कर दो

तेरे घर आगे से हो रही गुजर आखरी
तुम अब तो मुझे आखरी इक सलाम कर दो

मेरे दामन में भर दो चाहे तमाम खार
अल्लाह मेरी जानम को गुलफाम कर दो

मिल जाये उसे शायद शकून-ए-दौलत
बेचैन मुझे वक्त के हाथो नीलाम कर दो


Thursday, 6 September 2012

गिरफ्तार हूँ जुल्फों में पहले से जनाब मैं

तेरी खुमारी कम हो तो पीऊ शराब मैं
अब क्या लगाऊ अपनी बेखुदी का हिसाब मैं

कर्मजला इश्क  मुझे कही का ना छोड़ेगा
सिवा तेरे नही देखता कोई भी ख्वाब मैं

जब से तेरे लबो को गौर से देखा है
मुह सिकोड़ लेता हूँ देखकर गुलाब मैं

मुझे क्या करेगा जेल भीतर थानेदार
गिरफ्तार हूँ जुल्फों में पहले से जनाब मैं

क्या मेरी तरह से वो भी इश्क में पागल है
नही दे पाऊंगा सचमुच कोई जवाब मैं

कमबख्त दिल तो अभी तक भी बच्चा ठहरा
इसलिए लगाता हूँ बालों में हिजाब मैं

अश्को में दिखती है उसकी शक्ल बेचैन
बस इसलिए रखता हूँ  आँखे पुरआब मैं

Tuesday, 4 September 2012

मेरी तो हर सांस में है मौसम यादों का

कहो तो हलफनामा दे दूं अपने वादों का
जिंदगी कच्चा ना समझ मुझे इरादों का

मैं हालात की भट्ठी से तपकर निकला हूँ
नही है मुझमे कमीनापन शहजादों का

तू करता होगा फुरसत निकाल कर याद
मेरी तो हर सांस में है मौसम यादों का

हवस को जो महोब्बत का नाम देते है
बस चले तो नाश कर दूं हरामजादों का

सदा इश्क में रखूंगा भोलापन बेचैन
बेशक जमाना नही है सीधे-सादों का

Monday, 3 September 2012

ये मुस्कुराना कलेजे के पार लगता है


हुश्न तेरा बेहद ही खूंखार लगता है
तू तो कोई विदेशी हथियार लगता है

तुम्हारे लिए होगी जरा सी अदा मगर
ये मुस्कुराना कलेजे के पार लगता है

सचमुच नही होगा मन देखकर बेईमान
बता किस पर तुझको एतबार लगता है

आग बिजली शोला-ओ-कयामत एक साथ
मुझको तो तबाही का आसार लगता है

क्या सोचकर दे तुझे कोई फूल बेचैन
तू सरापा कोई गुलज़ार लगता है

Thursday, 23 August 2012

साला रोयेगा तो लोग कह देंगे भीगा हुआ है

वो बरसात के मौसम में ये सोचकर छोड़ गया
साला रोयेगा तो लोग कह देंगे भीगा हुआ है

हुश्न वालो की हुश्यारी देखकर सोचता हूँ
हरेक दांवपेच माँ के पेट से सीखा हुआ है

इतना भी रंज ना करो किसी की बेवफाई का
आपके साथ वो हुआ जो नसीब में लिखा हुआ है

महोब्बत, रिश्ते, व्यपार सब मुखोटाधारी है
आज अपने ईमान पर बता कौन टिका हुआ है

महबूब क्यूं करेगा फ़िक्र तुझ मुफलिस की बेचैन
वो ऐसो-आराम के हाथों में बिका हुआ है

Monday, 20 August 2012

खुदा जाने किस हाल में चाँद मेरा

मजबूरियों के जाल में है चाँद मेरा
खुदा जाने किस हाल में चाँद मेरा

ईद का मौका है मैं खुश तो हूँ मगर
अनसुलझे सवाल में है चाँद मेरा

तभी अपना दीदार नही करवाया
शायद मलाल में है में चाँद मेरा

जीते जी नही टूटेगा यह भ्रम
मेरे इस्तकबाल में है चाँद मेरा

परियो का जिक्र है जहाँ भी बेचैन
हरेक उस मिसाल में है चाँद मेरा

हमें तो अपनों ने गुलाम बनाया हुआ है

व्यवस्थाओ को पसीना आया हुआ है
इसलिए तो आदमी घबराया हुआ है

प्रशासन के चेहरे से साफ़ झलकता है
बुरी तरह से खादी का सताया हुआ है

होते अंग्रेज तो फिर भगा देते देशभग्त
हमें तो अपनों ने गुलाम बनाया हुआ है

किरदार नेताओ का छिपा नही किसी से
कितना टुच्चापन इनमे समाया हुआ है

अहिंसा का ढोल पीटने वालो शर्म करो
गाँधी का फूल देश में कुम्हलाया हुआ है

सुविधाओ ने मेहनत को मारा है जब से
अय्यासी ने जमीर बेचकर खाया हुआ है

यह कैसी शर्मिंदगी है माथे पर  बेचैन
जिसे भी देखो वही शख्स पछताया हुआ है


Monday, 13 August 2012

इश्क आदमी को दुनियादारी सिखाता है

वो दर्द बनकर ज़हन में जब उतर जाता है
शेर कहने का ढंग मुझे तभी तो आता है

कोई यकीं नही करेगा मगर सच कहता हूँ
वो तस्वीर से निकलकर अक्सर बतियाता है

कोई पागलपन कहे तो सौ बार कहे मगर
उसके ख्यालो को दिल ओढ़ता बिछाता है

रति भर भी झूठ नही इस जुमले में दोस्तों
इश्क आदमी को दुनियादारी सिखाता है

ईद होली दीपावली जैसी ख़ुशी मिलती है
मेरी सेहत की वो जब भी फ़िक्र उठाता है

खुल जाते है जख्मो के सब टांके बेचैन
वो जरा सी भी जब नाराजगी जताता है

Sunday, 12 August 2012

मुझे फरेब के दांवपेंच चलाने नही आते

मुझे चेहरे पर मुखौटे लगाने नही आते
शायद इसीलिए रिश्ते निभाने नही आते

मैं तो संजीदगी में लेता हूँ जीने का मज़ा
मुझे मस्ती के चोंचले अपनाने नही आते

बताओ कैसे पोत लूं झूठ से ज़हन अपना
मुझे फरेब के दांवपेंच चलाने नही आते

वो और ही होंगे जो थूक कर चाट लेते है
मुझको वायदे अपने झूठलाने नही आते

उसको लेकर देता हूँ रोज नया इंतिहान
ये नही की लोग मुझे उकसाने नही आते

उसका इसलिए नही मानता बुरा मैं कभी
दुखो की सौगात देने बेगाने नही आते

जब से मालूम हुआ इनमे खुदा बसता है
बच्चे मुझको बेचैन धमकाने नही आते