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Sunday, 22 July 2012

इक शक्स तो बताओ जिसे चैन हो यारो

एक काम की बात चलो सबको बताते है
दुश्मन होते नही है हम खुद ही बनाते है

खुद जैसा समझ लेते है सामने वाले को
बस सबसे बड़ी भूल हम यही कर जाते है

अक्सर रिश्तों से वही लोग मार खाते है
अपने शक को जो ओढ़ते और बिछाते है

कमबख्त वही बन जाते है नासूर दिल के
रो रोकर जिस पर भी अपना हक जताते है

इक शक्स तो बताओ जिसे चैन हो यारो
लोग बेकार ही मुझको  बेचैन बताते है

Saturday, 21 July 2012

अव्वल दर्जे की कलाकारी उसी में है

जमाने भर की समझदारी उसी में है
हमीं गद्दार है वफादारी उसी में है

यारों हम तो प्यार का नाटक कर रहे है
जैसे की संजीदगी सारी उसी में है

इश्क ने हमें तो जैसे अफसर बना दिया
मजबूरिया और लाचारी उसी में है

अपना तो जमीर शर्मिंदा है इक मुद्दत से
जैसे गैरत और खुद्दारी उसी में है

हम तो फिसड्डी है हरेक काम में बेचैन
अव्वल दर्जे की कलाकारी उसी में है

वो शायद मेरी हालत खराब में दिखता है

दिन भर ख्यालो में रात ख्वाब में दिखता है
पढने बैठता हूँ तो किताब में दिखता है

जब भी जाता हूँ टहलने गुलशन में यारो
नामुराद का चेहरा गुलाब में दिखता है

गम गलत करने को क्या ख़ाक जाऊ मयखाने
वो कमबख्त मुझको अब शराब में दिखता है

मुझे देख रहे है घूरकर इसीलिए लोग
वो शायद मेरी हालत खराब में दिखता है

आइना तू क्या बतायेगा राज की बात
यह सच है वो चश्मे- पुरआब में दिखता है

मैं या मेरा भगवान ही जानता है सब
वो कैसे ज़हन के इन्कलाब में दिखता है 

मैं हरेक बात का जिक्र अब क्या करू बेचैन
वो आहों के इक इक हिसाब में दिखता है

चश्मे- पुरआब=आंसूओ से भरी आँखे



Friday, 20 July 2012

तेरी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है

दर्द है आंसू है बेबसी है
बेहद मजे में जिंदगी है

कहने को तो पास है सबकुछ
इक बस तुम्हारी ही कमी है

मेरे हालात पर ना जाना
तेरी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है

तक रहा था तस्वीर तुम्हारी
इसलिए आँखों में नमी है

हो सके तो कर यकीं बेचैन
ये दिल्लगी नही दिल की लगी है

Thursday, 19 July 2012

क्यूं रोया मैं तेरे वास्ते ज़हन निचोड़ के

तुमने अच्छा नही किया मुझसे मुख मोड़ के
मैं रख रहा हूँ अपने ही दिल को तोड़ के

ढूंढें नही मिलूंगा तुझे आज के मैं बाद
गुमनामियों में जा रहा हूँ यादें ओढ़ के

सब मेरी ही भूल थी हां सब मेरा कसूर था
क्यूं रोया मैं तेरे वास्ते ज़हन निचोड़ के

और बातें सारी झूठी सच्ची एक बात
वो लौटते नही है जो जाते है छोड़ के

तेरी चाहतो से सौ गुना मैं प्यार दे चला
कभी देखना फुरसत में तू हिसाब जोड़ के

तन्हाइयों ने निगला है उनको ही दोस्तों
जो देखते नही कभी खुद को झंझोड़ के

तू खुद ही कर गया मुझे अपाहिज बेचैन
अब मुमकिन नही आऊँ तेरे पास दौड़ के

Sunday, 15 July 2012

अब दूर बैठे क्या समझाये ज़ज्बात क्या है

कोई हमें भी तो बताये मामलात क्या है
हंगामा बरप रहा है आखिर बात क्या है

दोस्ती से बढ़कर नही होता कोई रिश्ता
फिर महबूबाओ की कहिये औकात क्या है

वो पास होता तो समझाता बारीकी सी
अब दूर बैठे क्या समझाये ज़ज्बात क्या है

मुफलिसों को टका सा जवाब देने वालों
पहले यह तो पूछ लो तुमसे सवालात क्या है

रोज लुटती आबरू देख कर कोई तो बताये
बेबस के लिए शहर क्या है जंगलात क्या है

बरसों बाद मिलने का करार देने वाले
बता तो सही साल महीने दिन लम्हात क्या है

रूबरू नही तो कम से कम ख्वाब में ही बोल
बेचैन को लेकर तेरे ख्यालात क्या है

मैं भी हूँ जिंदगी तो गुजारो मुझे

अक्स हूँ मैं तुम्हारा विचारो मुझे
जिंदा रहने दो या फिर मारो मुझे

दब ना जाऊ कही वक्त की रेत में
मौका है जानम तुम संवारों मुझे

कर चुका एलान जान हो तुम मेरी
मैं भी हूँ जिंदगी तो गुजारो मुझे

तुझको मैं दे रहा हूँ कब से सदा
अनसुना मत करो तुम पुकारों मुझे

प्यार हूँ या बला सोच लो बैठ कर
कुछ तो पहचान दो तुम यारो मुझे

चीखकर कह रही है मेरी बेबसी
गलत हूँ मैं अगर तो सुधारो मुझे

चैन मरकर भी बेचैन ना आएगा
कर्ज़ हूँ मैं तुम्हारा उतारों मुझे

Saturday, 14 July 2012

आटे में नमक मिलाना मत भूल

सच -झूठ का दोस्ताना मत भूल
आटे में नमक मिलाना मत भूल

कामयाबी झक मारकर आएगी
खुद को काबिल बनाना मत भूल

उम्मीदें है औलाद से अगर
तू गलती पर धमकाना मत भूल

हवस और महोब्बत अलग अलग है
फर्क दोनों के दरमियाना मत भूल

उसूलो से छेड़ करे जो शख्स
तमाचा उसे लगाना मत भूल

आराम से रह कोठियों में मगर
तू घर अपना पुराना मत भूल

भूल जा बेशक याददश्त बेचैन
उसका मगर मुस्कुराना मत भूल




Saturday, 7 July 2012

तकदीर मगर देखो हूर जैसी है

शक्ल मेरी बेशक लंगूर जैसी है
तकदीर मगर देखो हूर जैसी है

ताकत और मिठास देती है दोनों
महबूब की बातें खजूर जैसी है

मत सोचने दे मुझे राख हो जाऊंगा
ज़ज्बात की गर्मी तंदूर जैसी है

बस इसी बात का अफ़सोस है मुझे
वो करीब होकर भी दूर जैसी है

जब देखो पेचीदगी भरी दिखती है
आदत तेरी किसी दस्तूर जैसी है

वो कोशिश करे सूखकर किसमिस बने
जिस शख्स की हालत अंगूर जैसी है

अब इससे ज्यादा क्या कहूं बेचैन
पाकीजगी मुझमे सिन्दूर जैसी है

Friday, 6 July 2012

पंछी की आँखों में सवालात दिखाई ना दिए

खुदगर्जी तो दिख गई हालात दिखाई ना दिए
गरीब के किसी को ज़ज्बात दिखाई ना दिए

सैयाद की भूख को तो मिल गया जवाब मगर
पंछी की आँखों में सवालात दिखाई ना दिए

ग्रांट दिलाने का वादा तो सबको दिखा मगर
विधायक के किसी को ख्यालात ना दिखाई दिए

सिर्फ वही लोग हुवे है जमाने में कामयाब
काम करते वक्त जिनको दिन रात दिखाई ना दिए

ड्राइंग रूम तो बेचैन सबको अच्छा लगा
घर में मगर केक्ट्स के जंगलात दिखाई ना दिए

कुत्ते की पूंछ में सीधापन आ जाएगा

छोड़ देगी जिस रोज शक करना लडकियाँ
कुत्ते की पूंछ में सीधापन आ जाएगा

तकदीर में लिखा है तो हाय तौबा छोड़
तेरे पास चलकर खुद धन आ जाएगा

वो बुढ़ापे में भी इश्क की बातें करेगा
मिजाज में जिसके बांकपन आ जायेगा

वो फिर पाताल में पीछा नही छोड़ेगा
अगर हुस्न का इश्क पर मन आ जायेगा

पहला शेर तुझ पर ही लिखूंगा बेचैन
शायरी का मुझे जिस दिन फन आ जायेगा

Tuesday, 3 July 2012

जान तू अगर मेरे लिए कोई ख्वाब हो गया

तुझको भुलाने में मैं अगर कामयाब हो गया
पछताओगे जो पैदा तेरा जवाब हो गया

बह निकले तेरे नाम के जो कभी अश्क आखरी
फिर समझो तुम्हारा मेरा सब हिसाब हो गया

आँखों को दिल को दे ना सके ठंडक जो दोस्तों
बेकार महोब्बत में वो फिर महताब हो गया

चाहकर भी इस जन्म में कभी मिल न सकोगे
जान तू अगर मेरे लिए कोई ख्वाब हो गया

बेचैन बता देगा अगर कोई भी पूछेगा
हद से जियादा काँटों का तू गुलाब हो गया

Monday, 2 July 2012

जिसे भी देखिए आजमाने को दौड़ता है

अहसास की धज्जी उड़ाने को दौड़ता है
साला हर एक रिश्ता खाने को दौड़ता है

कुछ खोने के लिए कोई भी तैयार नही है
कमबख्त हरेक इंसा पाने को दौड़ता है

खुद पर भरोसा तो जैसे जन्मजात नही है
जिसे भी देखिए आजमाने को दौड़ता है

कोई रूठ कर जाता है तो बेशक चला जाए
आज कौन किसे भला मनाने को दौड़ता है

मुआमला प्यार का हो तो जरा सोच बेचैन
कौन गरीब का हक दिलवाने को दौड़ता है

Friday, 29 June 2012

कितने युगों तक मन मारता रहूँ

कुछ ना कहूं बस तुझे निहारता रहूँ
अश्कों से आरती उतारता रहूँ

सचमुच करूंगा इंतजार लेकिन बता
कितने युगों तक मन मारता रहूँ

बस इतनी इनायत करना राधे
ता-उम्र तेरा नाम पुकारता रहूँ

तुमको पाकर जग जीत लिया लेकिन
अपने आप से कब तक हारता रहूँ

किसी रोज तो देख तू आकर बेचैन
और कितना दर्द बता संवारता रहूँ

Wednesday, 27 June 2012

कम से कम मजाक तो ना कर मेरे प्यार के साथ

तू छेड़छाड़ ना कर मेरे किरदार के साथ
मैं खुश हूँ अपने फकीरी व्यवहार के साथ

दौलत की हवस मुझमे अगर जागी किसी रोज
छोड़ जाऊंगा तुझको तेरे संसार के साथ

मेरा है तो मेरे अश्क तू पौंछ दे आकर
वरना क्यूं चाहता है मरू इंतजार के साथ

मुझको तू अपना समझ या न समझ तेरी ख़ुशी
कम से कम मजाक तो ना कर मेरे प्यार के साथ

खुदगर्जी के सिवा वह कुछ न मिलेगा बेचैन
मैं जुड़ना ही नही चाहता बाज़ार के साथ




Monday, 25 June 2012

तुझसे जियादा प्यारी नही है अपनी खाल मुझे

मैं गलतफहमी में हूँ तो मत बाहर निकाल मुझे
खूब राहत दे रहा है मेरा ही ख्याल मुझे

कही अँधा ना कर दे मुझे ख्वाबो की रौशनी
तू संजीदगी से सोचता है तो सम्भाल मुझे

आजकल हर बात पर आँखे छलक जाती है
जाने क्या दे जायेगा मौजूदा साल मुझे

बिना बात के तू बेशक उठा दिया कर तूफां
अच्छा लगने लगा है तेरा हर बवाल मुझे

अगर समझ सकता है तो समझ दर्दे दिल मेरा
बहुत ज्यादा जरूरत है तेरी फिलहाल मुझे

कालीन की जगह बिछानी पड़ी तो बिछा दूंगा
तुझसे जियादा प्यारी नही है अपनी खाल मुझे

दुनिया मेरी खूब देखी भाली है बेचैन
बेहतर होगा मत दे कोई भी मिसाल मुझे

Monday, 18 June 2012

बता किस शमा का शहर में परवाना नही है

तेरा मुझसे अगर सचमुच याराना नही है
जा फिर ये शख्स भी तेरा दीवाना नही है

शक की मेरे सर पर तलवार लटकाने वाले
शायद तुमने मुझे ढंग से पहचाना नही है

जब दिल करता है घर बैठ कर पी लेता हूँ
मेरे घर के करीब कोई मयखाना नही है

सब तुझसे मिलने के बाद ही तो महके है
मेरे दिल में कोई भी जख्म पुराना नही है

दोस्तों आग की तकदीर होता है धुंआ
बता किस शमा का शहर में परवाना नही है

महोब्बत में वही लोग पाते है दुःख बेचैन
महबूब को जिसने भी अपना माना नही है

Friday, 8 June 2012

विज्ञापनबाज़ी में फंस अखबार गिर गये

बाकि तो सब ठीक है पर किरदार गिर गये
भाईचारे के हर तरफ व्यवहार गिर गये

खबरों की प्रधानता तो अब रही ही नही
विज्ञापनबाज़ी में फंस अखबार गिर गये

खुदगर्जी ने कर डाले इस कदर अंधे
दूर दूर तक सब रिश्तेदार गिर गये

ख़ाक करेगा आम आदमी खरीदारी
शापिंग मॉल में ढलकर बाज़ार गिर गये

अब तो फूलों से ही खरी चुभन मिलती है
तीखे तेवरों वाले सब खार गिर गये

क्यूं नही होगा कत्ल अहसास का बेचैन
रिश्तों के जब सारे एतबार गिर गये

Thursday, 7 June 2012

कुछेक आदतें फर्जी तो सब मे होती है

आध पाव खुदगर्जी तो सब मे होती है
कुछेक आदतें फर्जी तो सब मे होती है

बेशक अपने मन से करो काम कोई भी
मुए वक्त की मर्जी तो सब मे होती है

अपने हाथों से अपने आंसू पौंछ ले
इतनी सी एनर्जी तो सब मे होती है

समाज सेवा का बेशक ढिंढोरा पीटो
गरीब से एलर्जी तो सब में होती है

कोई खुलकर ना कहे तो बेचैन क्या करे
इश्क की एक अर्जी तो सब में होती है

Tuesday, 5 June 2012

राजनीती में जरूरी है चिकना घडा होना

सांप का क्या तो छोटा और क्या बड़ा होना
राजनीती में जरूरी है चिकना घडा होना

इन्साफ की राह में सबसे बड़ी रुकावट है
गरीबों के लिए कानून का हिजड़ा होना

कोठियों और बैलेंस को रूतबा ना बोल
सच है माँ बाप का कोने में पड़ा होना

कामयाबी के बाद जो सबसे अच्छा लगा
तेरा भाईचारे में बीच में खड़ा होना

बात तो मेहनत से ही बनेगी नौजवान
सबके नसीब में नही है धन का गड़ा होना

लाज़मी है बहुत ही शायरी में बेचैन
महोब्बत के किसी जख्म का गला सड़ा होना