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Monday, 20 August 2012

खुदा जाने किस हाल में चाँद मेरा

मजबूरियों के जाल में है चाँद मेरा
खुदा जाने किस हाल में चाँद मेरा

ईद का मौका है मैं खुश तो हूँ मगर
अनसुलझे सवाल में है चाँद मेरा

तभी अपना दीदार नही करवाया
शायद मलाल में है में चाँद मेरा

जीते जी नही टूटेगा यह भ्रम
मेरे इस्तकबाल में है चाँद मेरा

परियो का जिक्र है जहाँ भी बेचैन
हरेक उस मिसाल में है चाँद मेरा

हमें तो अपनों ने गुलाम बनाया हुआ है

व्यवस्थाओ को पसीना आया हुआ है
इसलिए तो आदमी घबराया हुआ है

प्रशासन के चेहरे से साफ़ झलकता है
बुरी तरह से खादी का सताया हुआ है

होते अंग्रेज तो फिर भगा देते देशभग्त
हमें तो अपनों ने गुलाम बनाया हुआ है

किरदार नेताओ का छिपा नही किसी से
कितना टुच्चापन इनमे समाया हुआ है

अहिंसा का ढोल पीटने वालो शर्म करो
गाँधी का फूल देश में कुम्हलाया हुआ है

सुविधाओ ने मेहनत को मारा है जब से
अय्यासी ने जमीर बेचकर खाया हुआ है

यह कैसी शर्मिंदगी है माथे पर  बेचैन
जिसे भी देखो वही शख्स पछताया हुआ है


Monday, 13 August 2012

इश्क आदमी को दुनियादारी सिखाता है

वो दर्द बनकर ज़हन में जब उतर जाता है
शेर कहने का ढंग मुझे तभी तो आता है

कोई यकीं नही करेगा मगर सच कहता हूँ
वो तस्वीर से निकलकर अक्सर बतियाता है

कोई पागलपन कहे तो सौ बार कहे मगर
उसके ख्यालो को दिल ओढ़ता बिछाता है

रति भर भी झूठ नही इस जुमले में दोस्तों
इश्क आदमी को दुनियादारी सिखाता है

ईद होली दीपावली जैसी ख़ुशी मिलती है
मेरी सेहत की वो जब भी फ़िक्र उठाता है

खुल जाते है जख्मो के सब टांके बेचैन
वो जरा सी भी जब नाराजगी जताता है

Sunday, 12 August 2012

मुझे फरेब के दांवपेंच चलाने नही आते

मुझे चेहरे पर मुखौटे लगाने नही आते
शायद इसीलिए रिश्ते निभाने नही आते

मैं तो संजीदगी में लेता हूँ जीने का मज़ा
मुझे मस्ती के चोंचले अपनाने नही आते

बताओ कैसे पोत लूं झूठ से ज़हन अपना
मुझे फरेब के दांवपेंच चलाने नही आते

वो और ही होंगे जो थूक कर चाट लेते है
मुझको वायदे अपने झूठलाने नही आते

उसको लेकर देता हूँ रोज नया इंतिहान
ये नही की लोग मुझे उकसाने नही आते

उसका इसलिए नही मानता बुरा मैं कभी
दुखो की सौगात देने बेगाने नही आते

जब से मालूम हुआ इनमे खुदा बसता है
बच्चे मुझको बेचैन धमकाने नही आते

Saturday, 11 August 2012

सीने से लगाकर कमबख्त किताब रखता है

हुश्न अपनी अदाओ का कब हिसाब रखता है
ये मुनीमी आशिक का दिले-बेताब रखता है

अब कौन समझाए इस खूबसूरत बला को
पड़ोसी भी उसे पाने का ख्वाब रखता है

वो रफ्तार धडकनों की थामने के बहाने
सीने से लगाकर कमबख्त किताब रखता है

उसे देख हो ना जाये कही ट्रेफिक जाम
इसलिए चेहरे पर ढककर हिजाब रखता है

वो पीयेगा इन आँखों से पटियाला पैग
जो रगों में अपने मस्ती-ए-पंजाब रखता है

उसके बदन की महक कही कर न दे हंगामा
इसलिए जुल्फों पर लगाकर गुलाब रखता है

हो सके तो अपना बहम दफना दे बेचैन
कौन किसके लिए आँखे पुरआब रखता है

Friday, 10 August 2012

उनसे की उम्मीदे सारी समेटता चलूँ

आह,तडफ और बेकरारी समेटता चलूँ
उनसे की उम्मीदे सारी समेटता चलूँ

आज के बाद शायद हो इस राह से गुजर
सफर की हर एक यादगारी समेटता चलूँ

बहुत करवा चुका खराब मिटटी जज्बात की 
गिले-शिकवो की रेजगारी समेटता चलूँ

आने वाली पीढ़ियों को ना लगे ये रोग
मैं क्यूं ना इश्क की बिमारी समेटता चलूँ

जोडकर प्यार की नकदी का हिसाब बेचैन
कसमें-वादों की उधारी समेटता चलूँ

Wednesday, 8 August 2012

धन्यावाद, मुझको कब्र तक छोड़कर जाने वालो

मैं ही जानता हूँ कितना खारा है यह पानी
शराबी -शराबी कहकर मुझे सताने वालो

मयकशी अचूक दवा होती है दर्दे जिगर की
सम्भलो,डाक्टरों से खुद को लुटवाने वालो

आगे का सफर अकेला ही तय कर लूँगा मैं
धन्यावाद, मुझको कब्र तक छोड़कर जाने वालो

तुम उसके भी तो कान खींचों जाकर किसी दिन
महोब्बत में मुझको ही सही गलत समझाने वालो

अब तो देख कर मुझे उड़ा लो कितनी ही हंसी
कभी होश में आया तो पूछूंगा जमाने वालो

किसी और का गुस्सा बोतल पर उतरा करेगा
अब तुम्हारी खैर नही है मयखाने वालो

गलतफहमी के शिकार हो जाओगे बेचैन
महबूब से हर बात का जिक्र उठाने वालो

Friday, 3 August 2012

ना मालूम था यूं गुज़ेगी हमपे अब की साल यारों

इश्क ने हमसे सब कुछ लूटा कर डाले कंगाल यारों
ना मालूम था यूं गुज़ेगी हमपे अब की साल यारों

आँख में आंसू आहें लबों पर दिल में धुंआ सा उठता है
बेबस है बस जीने को और मरना हुआ है मुहाल यारो

ख्वाब दिखाए थे जो उसने सबके सब वो फर्जी थे
रोज पशेमा करते है अब मुझको मेरे ख्याल यारो

जो पाक महोल्ब्ब्त करते है वो खून के आंसू रोते है
कोई नही करता है उनकी आज के दिन सम्भाल यारो

चैन गंवाकर ही सीखा है हमने महोब्बत में बेचैन
अच्छी सूरत वाले ही तो बनते है जी का जंजाल यारो

Wednesday, 1 August 2012

वो बहन मुझे राखी बांधे जिनका भाई नही है

 अभी रिश्तो में इतनी गिरावट आई नही है
वो बहन मुझे राखी बांधे जिनका भाई नही है

किसी की आँखों में देखू रक्षा बंधन पर आंसू
कम से कम मेरा ज़हन इतना तमाशाई नही है

हमारी ही कमी से है आज टोटा लडकियों का
इसमें कुदरत की कही से भी अगुआई नही है

सदा याद रखना बेटे की चाहत रखने वालों
बिना बेटी के मुक्ति देवो ने भी पाई नही है

महबूबा को परी कहने वालो सच सच बताओ
क्या बहन में बेचैन खूबसूरती समाई नही है



Tuesday, 31 July 2012

आज कोई भी रिश्ता बेजोड़ नही रहा

मन तो अपना कबका उड़ चुका बाकि
उसका अहसास है की छोड़ नही रहा

बकाया है इश्क की आखरी रिवायत
वो पूरी तरह से दिल तोड़ नही रहा

सोच क्या है किसी हद तक गिर सकती है
विचारो का आज कोई निचोड़ नही रहा

गुज़रा है ऐसी संकरी गलियों से जहन
जिंदगानी में अब ढंग का मोड़ नही रहा

तैयार है जवाब हर किसी का बेचैन
आज कोई भी रिश्ता बेजोड़ नही रहा

Monday, 30 July 2012

उसूलो के खिलाफ जाकर प्यार कर रहा हूँ

कुछ इस तरह से खुद को गुनेहगार कर रहा हूँ
उसूलो के खिलाफ जाकर प्यार कर रहा हूँ

मालूम है तेरा जिंदगी में आना नही मुमकिन
मैं फिर भी भरी आँखों से इंतजार कर रहा हूँ

सजाकर ख्वाबो ख्यालो की रोजाना एक दुनिया
मैं रूह को कभी जमीर को शर्मसार कर रहा हूँ

जफा-ओ-वफा जो देनी है सोच समझकर देना
मैं हद से जियादा तुझ पर एतबार कर रहा हूँ

तू महसूस कर सके तो कभी कर आकर बेचैन
मैं दर्द को आहों से हर पल गुलज़ार कर रहा हूँ

Saturday, 28 July 2012

आशिक तो दोस्तों हर हाल में पछताता है

वो प्यार के मसले पर जब भी बतियाता है
मुझे मेरे सवालों के साथ छोड़ जाता है

समझ नही पाया उसका अंदाज़े महोब्बत
खुद ही दर्द देकर खुद ही मरहम लगाता है

अहसास के मुसाफिर बाखूबी जानते है
कौन किसको जबरदस्ती खींचकरलाता है

हुआ बेबसी के हवाले तो इल्म हुआ भारी
आशिक तो दोस्तों हर हाल में पछताता है

अफ़सोस के दायरे में भी वही रहता है
जो रिश्तों पर ज्यादा उंगलिया उठाता है

मुझे गुस्सा भी अक्सर इसीलिए आता है
वो बात को गेंद सा गोल-गोल-घुमाता है

उसकी जुल्फें मेरे ज़ज्बात उलझे है
देखते है वक्त पहले किसको सुलझाता है

उतर तो जाता हूँ रोज यादों की नदी में
जबकि मुझे बेचैन तैरना नही आता है



Friday, 27 July 2012

हां सांसो की सबसे पहली हकदार हो तुम

मेरे दिल के थाने की थानेदार हो तुम
अब कितनी दफा समझाऊ मेरा प्यार हो तुम

जिद छोड़ भी दे बिना बात नाराज होने की
मेरी सबसे बड़ी जीत और हार हो तुम

मैं अक्स हूँ तुम्हारा कोई आशिक नही हूँ
कहो किस बात पर फिर इतना शर्मसार हो तुम

वक्त और किस्मत ने चाहा तो मिल जायेगे
वरना जन्म भर का मेरा इंतजार हो तुम

तुम ही लहू बनकर दौड़ रही हो रगों में
हां सांसो की सबसे पहली हकदार हो तुम

तेरी तस्वीर देख कर ही खिल उठता हूँ
सचमुच मेरे लिए मौसमे बहार हो तुम

नही है कोई तुझसा जमाने में बेचैन
बस अहसास में इसलिए गिरफ्तार हो तुम

Tuesday, 24 July 2012

हमने अनाज कम फरेब ज्यादा खाया है

वक्त के मारों ने तजुर्बे से बताया है
हमने अनाज कम फरेब ज्यादा खाया है

दोस्ती ही सम्भालती है बढ़कर आगे
खून के रिश्तों ने जब भी रंग दिखाया है

किसी के भी बस का नही होता जो इंसा
आखिरकार औलाद के काबू आया है

कामयाबी उससे सख्त नफरत करती है
अपने माँ बाप का जिसने दिल दुखाया है

मातम मनाकर अपनी बेबसी का पहले
गरीब ने बेटी का जब ब्याह रचाया है

आटे दाल का भाव तो उससे पूछिये
अपने बूते पर जिसने घर बसाया है

इश्क और-सियासत है उनकी बेचैन
चेहरे पर जिसने चेहरा चढाया है

Sunday, 22 July 2012

इक शक्स तो बताओ जिसे चैन हो यारो

एक काम की बात चलो सबको बताते है
दुश्मन होते नही है हम खुद ही बनाते है

खुद जैसा समझ लेते है सामने वाले को
बस सबसे बड़ी भूल हम यही कर जाते है

अक्सर रिश्तों से वही लोग मार खाते है
अपने शक को जो ओढ़ते और बिछाते है

कमबख्त वही बन जाते है नासूर दिल के
रो रोकर जिस पर भी अपना हक जताते है

इक शक्स तो बताओ जिसे चैन हो यारो
लोग बेकार ही मुझको  बेचैन बताते है

Saturday, 21 July 2012

अव्वल दर्जे की कलाकारी उसी में है

जमाने भर की समझदारी उसी में है
हमीं गद्दार है वफादारी उसी में है

यारों हम तो प्यार का नाटक कर रहे है
जैसे की संजीदगी सारी उसी में है

इश्क ने हमें तो जैसे अफसर बना दिया
मजबूरिया और लाचारी उसी में है

अपना तो जमीर शर्मिंदा है इक मुद्दत से
जैसे गैरत और खुद्दारी उसी में है

हम तो फिसड्डी है हरेक काम में बेचैन
अव्वल दर्जे की कलाकारी उसी में है

वो शायद मेरी हालत खराब में दिखता है

दिन भर ख्यालो में रात ख्वाब में दिखता है
पढने बैठता हूँ तो किताब में दिखता है

जब भी जाता हूँ टहलने गुलशन में यारो
नामुराद का चेहरा गुलाब में दिखता है

गम गलत करने को क्या ख़ाक जाऊ मयखाने
वो कमबख्त मुझको अब शराब में दिखता है

मुझे देख रहे है घूरकर इसीलिए लोग
वो शायद मेरी हालत खराब में दिखता है

आइना तू क्या बतायेगा राज की बात
यह सच है वो चश्मे- पुरआब में दिखता है

मैं या मेरा भगवान ही जानता है सब
वो कैसे ज़हन के इन्कलाब में दिखता है 

मैं हरेक बात का जिक्र अब क्या करू बेचैन
वो आहों के इक इक हिसाब में दिखता है

चश्मे- पुरआब=आंसूओ से भरी आँखे



Friday, 20 July 2012

तेरी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है

दर्द है आंसू है बेबसी है
बेहद मजे में जिंदगी है

कहने को तो पास है सबकुछ
इक बस तुम्हारी ही कमी है

मेरे हालात पर ना जाना
तेरी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है

तक रहा था तस्वीर तुम्हारी
इसलिए आँखों में नमी है

हो सके तो कर यकीं बेचैन
ये दिल्लगी नही दिल की लगी है

Thursday, 19 July 2012

क्यूं रोया मैं तेरे वास्ते ज़हन निचोड़ के

तुमने अच्छा नही किया मुझसे मुख मोड़ के
मैं रख रहा हूँ अपने ही दिल को तोड़ के

ढूंढें नही मिलूंगा तुझे आज के मैं बाद
गुमनामियों में जा रहा हूँ यादें ओढ़ के

सब मेरी ही भूल थी हां सब मेरा कसूर था
क्यूं रोया मैं तेरे वास्ते ज़हन निचोड़ के

और बातें सारी झूठी सच्ची एक बात
वो लौटते नही है जो जाते है छोड़ के

तेरी चाहतो से सौ गुना मैं प्यार दे चला
कभी देखना फुरसत में तू हिसाब जोड़ के

तन्हाइयों ने निगला है उनको ही दोस्तों
जो देखते नही कभी खुद को झंझोड़ के

तू खुद ही कर गया मुझे अपाहिज बेचैन
अब मुमकिन नही आऊँ तेरे पास दौड़ के

Sunday, 15 July 2012

अब दूर बैठे क्या समझाये ज़ज्बात क्या है

कोई हमें भी तो बताये मामलात क्या है
हंगामा बरप रहा है आखिर बात क्या है

दोस्ती से बढ़कर नही होता कोई रिश्ता
फिर महबूबाओ की कहिये औकात क्या है

वो पास होता तो समझाता बारीकी सी
अब दूर बैठे क्या समझाये ज़ज्बात क्या है

मुफलिसों को टका सा जवाब देने वालों
पहले यह तो पूछ लो तुमसे सवालात क्या है

रोज लुटती आबरू देख कर कोई तो बताये
बेबस के लिए शहर क्या है जंगलात क्या है

बरसों बाद मिलने का करार देने वाले
बता तो सही साल महीने दिन लम्हात क्या है

रूबरू नही तो कम से कम ख्वाब में ही बोल
बेचैन को लेकर तेरे ख्यालात क्या है