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Friday, 2 December 2011

अपना तो यारी से भरोसा उठ सा गया

कल जिसे ऊँगली पकड़ चलना सिखाया था
आज हमसे ही दौड़ने की शर्त लगा गया

अहसान फरामोशों की बढ़ रही है तादाद
मेरे अल्लाह जमी पर ये कैसा वक्त आ गया

उस दिन समझा औलाद की समझदारी
जब बेटा अपने बाप को नादान बता गया

वो कुत्ते पर जितना आये रोज खर्चता है
गरीब का कुनबा उतने में महिना चला गया

जिस अदा से किया है मुझे बेचैन उसने
अपना तो यारी से भरोसा  उठ सा गया

Thursday, 1 December 2011

बहुत बड़ा कमबख्त इंतजार है वो

वादा खिलाफी में हुशियार है वो
इसलिए तो यारों का यार है वो

सबको नही हासिल आसानी से
बहुत बड़ा कमबख्त इंतजार है वो

मैं ही सोचा विचारी में फसां हुआ हूँ
अपने किये पर कहाँ शर्मसार है वो

ता-उम्र शुमार होगा मेरे अजीजों में
फक्त इसलिए की मेरा इकरार है वो

इसलिए नही बनी उसकी आबरू पर
मेरा गलती से बेचैन रिश्तेदार है वो

Sunday, 27 November 2011

वो आराम से कुत्ते पालते है

हमसे तो शौक भी नही पलता
वो आराम से कुत्ते पालते है

सलामत रहे हौसला उनका
जो गम को गेंद सा उछालते है

उम्र भर पाते है वो लोग दुख
जो बात-बात पर बातें टालते हैं

सुना है उसे शौहरत मिलती है
मछलियों को जो दाना डालते है

पूछ ही लेते है दोस्त हाल बेचैन
रिश्तेदार भला कब सम्भालते है

पीने के बाद हनुमान बन जाता हूँ

  पीने के बाद हनुमान बन जाता हूँ
अपने मोहल्ले की शान बन जाता हूँ

मैं खूब खोलता हूँ पोल पड़ोसियों की
जब सच बोलने की खान बन जाता हूँ

जब लगाते है लोग शर्त मेरे होश पर
तब मैं गीता और कुरआन बन जाता हूँ

कर के देखो मुझसे किसी बात पर बहस
नशे में जहाँ भर का मैं ज्ञान बन जाता है

देता हूँ बेचैन ऊंचाई छोटे भाई को मैं
जाम लगाकर जब आसमान बन जाता हूँ

Friday, 25 November 2011

बस उम्मीद ने ही जीना दुश्वार कर दिया

दुश्मनों की चालों का मैं तो दे दूंगा जवाब
क्या होगा गर दोस्तों ने भी वार कर दिया

अब तक तो यही सिखलाया है तजुर्बे ने
वही मुकरेगा जिसने इकरार कर दिया

वही जुबान कहलाएगी रसभरी दोस्तों
जिसने वादों का तीर दिल के पार कर दिया

महज़ एक वादा वफा करने की चाह में
क्यूं भरोसे का कत्ल तुमने यार कर दिया

बकाया तो सब कुछ काबू में है बेचैन
बस उम्मीद ने ही जीना दुश्वार कर दिया


Wednesday, 23 November 2011

मेरे हिस्से की मुझको खैरात याद आई

तेरे लबों को देखकर इक बात याद आई
गुलाब को भी अपनी औकात याद आई

सरे बज्म खिलखिलाकर तुम क्या हंसे
मुझको चांदनी की वो बरसात याद आई

मैं यूं इतराया अपनी खुशनसीबी पर
कॉलेज के दिनों की मुलाक़ात याद आई

अनजाने में जब मिलाया उसने हाथ
मेरे हिस्से की मुझको खैरात याद आई

अपनी तरह बेचैन जब देखा इक यार
हमें महोब्बत में मिली वो मात याद आई

आज अपने सुदामा को पिला दे कृष्णा

होश  का गिरेबां पकड़ के हिला दे कृष्णा
आज अपने सुदामा को पिला दे कृष्णा

कह रहे है लोग तू मस्ती का मालिक है
फिर थोड़ी मेरे जाम में मिला दे कृष्णा

अपना घर बसाऊं या फिर शराब पिऊ
फैसला कोई मजबूत सा सुझा दे कृष्णा

इक बार मिलने से तो दिल ना भरेगा
मुलाक़ात का ख़ास सिलसिला दे कृष्णा

बेचैन रहूँ उम्र भर होश के लिए मैं
तू नशे का फूल ऐसा खिला दे कृष्णा



Monday, 21 November 2011

काश कुछेक लोगों से रिश्तेदारी ना होती


वो दूर है इसलिए तो याद आता है अक्सर
होते एक ही शहर में तो बेकरारी ना होती

जीऊंगा जब तक ना मिट सकेगा ये धोखा
काश कुछेक लोगों से रिश्तेदारी ना होती

मिल ही जाता हाथों हाथ मेहनत का फल
गर मुझसे मेरे नसीब की पर्देदारी ना होती

ख़ाक खूब पीते है वो लोग जमाने में
सर पर जिसके किसी की उधारी ना होती

आ ही जाती समझ में अगर बात संतों की
फिर दुनिया में बेचैन मारा मारी ना होती

Sunday, 20 November 2011

जंगल में सीधे पेड़ पहले काटे जाते है

 जंगल में सीधे पेड़ पहले काटे जाते है
लोग शरीफजादों को इसलिए सताते है

मैंने छुपकर सुनी है अमीरों की बातचीत
वो मुफलिसों को आदमी थोड़े बताते है

तू परदेश में कमाने मत भेज तकदीर
अभी तक मेरे नौनिहाल बहुत तुतलाते है

जड़ों की मिट्टी को ठुकराकर कुछ नही बचेगा
यारों बियाबा के पेड़ रोज़ ही बतियाते है

बस होशमंदों को थोडा होश रहे बेचैन
शराबी नशे में महज़ इसलिए बुदबुदाते है

Saturday, 19 November 2011

वो सूदखोर नही तो मतलबी जरुर है

ज़हाज़ उड़ाने का उसे काम क्या आया
व्यवहार भी कमबख्त हवाई करता है

यूं तो मिलता है मुझसे भी मुस्कुराकर
मगर पीठ पीछे वो बुराई करता है

मैं मरूंगा जब तुम समझोगे छोटे
क्यूं फ़िक्र का सौदा बड़ा भाई करता है

अपनेपन की उससे उम्मीद ना रखिये
जो शख्स रिश्तों को तमाशाई करता है

वो सूदखोर नही तो मतलबी जरुर है
पैसे की औकात से नपाई करता है

 उसको ही बेवकूफ कहती है दुनिया
बिना सोचे जो शख्स भलाई करता है

जीते जी कभी भी खुल सकते है बेचैन
वक्त जिन जख्मो की तुरपाई करता है

मेरे भीतर की कस्तूरी मुझे भी तो पता लगे

 अल्लाह उसकी मजबूरी मुझे भी तो पता लगे
इंतजार के बीच की दूरी मुझे भी तो पता लगे

उलटे-सीधे ख्यालात दिल में पनाह ले रहे है
बेरहम वक्त की मंजूरी मुझे भी तो पता लगे

एक मुद्दत से खा रहा हूँ मैं ठोकरे दर-ब-बदर
मेरे भीतर की कस्तूरी मुझे भी तो पता लगे

महज़ अंदाज़े से उसे बेवफा करार कैसे दे दूं
आखिर दोस्तों बात पूरी मुझे भी तो पता लगे

सीखना पड़ता है बेचैन ये चमचागिरी का हुनर
करूं कितनी कहाँ जी हुजूरी मुझे भी तो पता लगे

Thursday, 17 November 2011

अब तो लड़ेंगे यारों आखरी दम तक


जब पहुँच गये है जिंदगी के खम तक
अब तो लड़ेंगे यारों आखरी दम तक

अपनी मौत को तो मौत आने से रही
आजमाकर तो देखे खुद को भ्रम तक

क्या बिगाड़ लेगी दुश्मन की तरकीब
कोई वार ही जब ना पहुंचेगा हम तक

मिटा देगी आदम ज़ात को मजहबी जंग
मत नफरत बिछाईएगा दैरो हरम तक

यूं ही नही खुल जाते जन्नत के दरवाजे
खुदा नापकर देखते है बेचैन करम तक

जिसने काटे हो कभी मुफलिसी के कुत्ते दिन

गरीबों का हमदर्द तो वही शख्स बन पायेगा
जिसने काटे हो कभी मुफलिसी के कुत्ते दिन

अर्श पर ले जाकर बेशक बैठा दो औकात
भूल कर तो दिखाओ जिंदगी के कुत्ते दिन

अपनी हस्ती पर दोस्त ना इतरा इस कदर
जाने कब आ जाएँ आदमी के कुत्ते दिन

मैंने भी महोब्बत करके देखी है दोस्तों
बहुत रुलाते है बेबसी के कुत्ते दिन

ध्यान से उठाना दुःख की तोहमत बेचैन
इतिहास बन जाते है गमी के कुत्ते दिन

Wednesday, 16 November 2011

चुगली समझता हूँ मैल ख्यालात का

समझ गया हूँ खेल है सारा जज्बात का
अब नही मानता मैं बुरा किसी बात का

बेशक कितनी करें बुराई मेरी दुश्मन
चुगली समझता हूँ मैल ख्यालात का

दिन के उजाले में ही होता है सब कुछ
अब इंतजार नही करता कोई रात का

तंज़ कसने वालों से ही सवाल है मेरा
कितना कद होना चाहिए औकात का

कमीन हर हाल में कमीन कहलायेगा
बेशक लबादा ओढ़ता हो मेरी ज़ात का

वो कल क्या करेगा इसकी फ़िक्र छोडो
जमाना है आजकल नगद करामात का

अगली दफा वो ही बाज़ी मारेगा बेचैन
जिसके समझ आया मतलब मात का

Monday, 14 November 2011

असली अंदाज़ में आकर मां-माँ कर दूं

सोचता हूँ आज पीकर हंगामा कर दूं
कई दिन हुवे मोहल्ले में ड्रामा कर दूं

दो-दो पैग देकर गली के सब बुढो को
मस्ती का पैदा एक कारनामा कर दूं

बहुत कान ऐंठे है बचपन से फूफा ने
क्यूं ना नशे में उसको मामा कर दूं

सच में अगर वो भी भूल गया है मुझे
खत्म यादों को खरामा-खरामा कर दूं

भूलके शर्म लिहाज़ पीने के बाद बेचैन
असली अंदाज़ में आकर मां-माँ  कर दूं


Sunday, 13 November 2011

हमजुबां से खुदा मुझको मिलाता क्यूं नही


कोई मजबूरी है तो मुझे बताता क्यूं नही
वो मेरी तरह यारी में पेश आता क्यूं नही

शक है मुझे समझकर भी नही समझा वो
समझ गया तो ढंग से समझाता क्यूं नही

दांतों तले ऊँगली दबाना तो छुट गया पीछे
मुझको देखकर अब वो शरमाता क्यूं नही

डालकर ख़ाक मेरी बरसों की दीवानगी पर
मेरी हालत पर थोडा रहम खाता क्यूं नही

टकरा ही जाते है बेचैन हर बार दुसरे लोग
हमजुबां से खुदा मुझको मिलाता क्यूं नही


वो दोस्ती से पहले मुखबरी करता है

वो दोस्ती से पहले मुखबरी करता है
तब जाकर अपना शक बरी करता है

करके चिकनी चुपड़ी बातें कमबख्त
मौका मिलते ही वो जादूगरी करता है

हर कदम हर रिश्ते से फरेब मिला है
वो इसलिए बात खोटी-खरी करता हैं

माँ का दर्दे दिल महसूस नही है जिसे
बेटा फिर बेकार ही अफसरी करता है


वो उतना ही शातिर निकलेगा बेचैन
जो जितनी जुबान रसभरी करता है

Saturday, 12 November 2011

ख्वाबों को बच्चे समझ पालता ही रहा

मेरा सब्र गेंद की तरह उछालता ही रहा
कल के नाम पर वो मुझे टालता ही रहा

न मालूम था नही हो पाएंगे कभी जवां
ख्वाबों को बच्चे समझ पालता ही रहा

दुबारा टूटे तमाम भ्रम एक-एक करके
दोस्ती में इस बार भी मुगालता ही रहा

इससे ज्यादा ना और कुछ कर सका मैं
बस गजलों पर भडास निकालता ही रहा

जवां होते ही मिला था जो दर्द यारों से
मुझको उमर भर बेचैन सालता ही रहा

Friday, 11 November 2011

आंसू न मेरी तरह किसी के तेज़ाब हो


इतना भी ना सोचो की दिमाग खराब हो
सवाल उलझते-उलझते लाजवाब हो

रोजाना खुदा से दुआ ये मांगता हूँ मैं
ना मेरे हाथों आज कोई भी अजाब हो

दिवार बटवारे की अगर नही चाहते हो
भाई से भाई का ना कोई हिसाब हो

आँखों की नमी दिलजला देती है बना
आंसू न मेरी तरह किसी के तेज़ाब हो

इतनी मेहर करना खुदा हम दीवानों पर
हालत ना इश्क में कभी भी इज़्तिराब हो

बेटी ही महकाती है घर और आंगन को
बेचैन ऐसा सबके हिस्से में गुलाब हो

Thursday, 10 November 2011

आग और पानी का किसको शौक है

होश औकात ना भूले इसलिए पीता हूँ
वरना खारे पानी का किसको शौक है

वो तो व्यापार में शर्त होती है वरना
अक्सर बेईमानी का किसको शौक है

बात मेरी नही किसी से भी पूछ लीजे
झूठी मेहरबानी का किसको शौक है

अय्यासी के मारे ही बतायेंगे यह सब
ना मुराद जवानी का किसको शौक है

छिपी नही बुजुर्गों से यह बात बेचैन
आग और पानी का किसको शौक है

भीड़ के कंधे चढ़ इन्कलाब कोई मत देखना

मरने से पहले माँ मुझे समझा कर गई थी
रिश्तेदारों के भरोसे ख्वाब कोई मत देखना

करना हो कभी जो, अपने बूते पर ही करना
भीड़ के कंधे चढ़ इन्कलाब कोई मत देखना

आँखों में ही नही दिल भी दिक्कत में होगा
एकटक कभी भी आफताब कोई मत देखना

वो शादीशुदा है बडेपन का भ्रम ना रखेगा
कभी छोटे भाई से हिसाब कोई मत देखना

अच्छी आदतें देखेगा तो सुख पायेगा बेचैन
दोस्तों की अदा कभी खराब कोई मत देखना

Wednesday, 9 November 2011

रोजाना माँ के पैरों में सर झुका लेता हूँ

बचूंगा तो नही फिर भी आजमा लेता हूँ
सितमगर के नाम पर ज़हर खा लेता हूँ

जब भी आया है कोई ख़ास चेहरा सामने
एक बारगी देखकर आँखे झुका लेता हूँ

यारों की महोब्बत का कमाल है वरना
मैं तो नही मानता मैं अच्छा गा लेता हूँ

यूं करता हूँ इबादत की रस्म अदायगी
रोजाना माँ के पैरों में सर झुका लेता हूँ

नही मालूम कब बनती है अच्छी गजल
मैं कलम तो बेचैन रोजाना चला लेता हूँ

अब नही निकलते चिरागों से जिन्न

 माँ और गरीबी को जिसने भुलाया है
बुलंदी से वो शख्स जमीं पर आया है

खूब खाता है रिश्तेदारों से गालियाँ
औकात को जिसने कच्चा चबाया है

निखरी है और भी उसकी कामयाबी
बुजुर्गों से जिसने आशीर्वाद पाया है

वक्त के इंतिहान में मार गया बाज़ी
नसीब को जिसने आइना दिखाया है

अब नही निकलते चिरागों से जिन्न
जो जान गया उसने कमाकर खाया है

वो संस्कारों को पटरी से उतरें है बेचैन
औलाद को जिसने सर पर चढ़ाया है



Monday, 7 November 2011

पीके होश वालो की चुगली खाता हूँ

अक्सर नशे का मजा यूं उठाता हूँ
पीके होश वालो की चुगली खाता हूँ

कर देता हूँ खाली एक घूँट में जाम
चुश्कियों के झंझट से जी चुराता हूँ

काम तो करना है जिंदगी भर दोस्तों
छुटी के दिन सिर्फ आराम फरमाता हूँ

बहुत से लोगों का मैं दुश्मन हूँ मगर
नही जानता मैं किस किसको भाता हूँ

सीने में इक दर्द सा महसूस करता हूँ 
जब कभी तुम्हारी यादों से टकराता हूँ

मौत से टकराने का हौशला है तो मगर
अपने आप से यारों मैं बेहद घबराता हूँ

ब्याज तक डकारता हूँ व्यपार में मगर
झूठी कसम मैं बेचैन कभी नही खाता हूँ


कुनबा भी बनेगा पाप का चश्मदीद

सच में गर चाहते हो खुदा का दीद
बकरा काट कर ना बनाओ बकरीद

मस्जिद की जगह घर में मकतल
कैसे हो भाई तुम मजहब के मुरीद

मारकर बेकसूर को खुद तो फसोगे
कुनबा भी बनेगा पाप का चश्मदीद


मांस की जगह सबको मिठाई बांटो
फिर कहो आपस में मुबारक हो ईद


दुखाकर किसी गरीब का दिल बेचैन
ना पीढ़ियों के लिए तकलीफें खरीद

Sunday, 6 November 2011

मजदूर का बेटा बेरोज़गार निकला

वो उम्मीद की हदों से पार निकला
मेरे रकीबों का पक्का यार निकला

देता रहा दिलासे पर दिलासा मुझे
वो बहानेबाजों का सरदार निकला

खबरें सम्पादक के दिल से गुजरी
जब भी छप कर अखबार निकला
दर्द आंसू और बेबसी का जानकार
आदमी नही एक कलाकार निकला

गरीबी के कंधे चढ़कर पढने पर भी
मजदूर का बेटा बेरोज़गार निकला



मुझे देखे बिना बेचैन होने वाले का
अहसास ही बाद में व्यपार निकला

Saturday, 5 November 2011

वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

औकात भूलकर भी वो शरमाता नही है
अजब शख्स है वजूद से घबराता नही है

खा खाकर झूठी कसमें सेहत बना गया
रोटी पे कमबख्त कभी ललचाता नही है

मिलते ही बताता है ख्यालात बड़े- बड़े
गरीबी के दिनों का जिक्र उठाता नही है

खबरों में उसने होने का यूं जिक्र किया
जैसे अखबार मेरे घर कभी आता नही है

अब समझा उसके व्यवहार की कंगाली
वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

वो तो पिछली सदी की शुरुआत थी यारों
आजकल अच्छे इन्सां खुदा बनाता नही है

सब तदबीर-ओ-तकदीर का खेल है बेचैन
जगत में कोई किसी का भी विधाता नही है



Sunday, 30 October 2011

भीड़ पर भी यकीन हुआ पर

कसम खुदा की मैं रो पडूंगा
गर ना मुडके तू पास आया

नसीब में क्यूं मेरे ही यारों
गम में डूबा अहसास आया
दिखलाता मैं परवाज़ अपनी
पर ना हिस्से आकाश आया
भीड़ पर भी यकीन हुआ पर
ना रिश्तों पर विश्वास आया
सच कहूं इस जन्म में बेचैन
ना इश्क हमको रास आया

दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते




मुझे मुनीमों की क्या जरूरत
दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते

अपने जरूरी काम भूलकर भी
याद मेरा वो हर ख्वाब रखते
हो चाहे चुगली बनाम बेशक
वो चर्चा मेरी बेहिसाब रखते
नशे की हद तक गुजरते है वो
जो जाम के संग कबाब रखते
ना यादें इतना महकती उनकी
ना किताबों में जो गुलाब रखते
निहाल होते डूबकर दोनों बेचैन
जो नसीब में कोई चनाब रखते

Saturday, 29 October 2011

जिन्हें मुकदर ना रास आया



खुदा करे वो भी रोये छिपकर
सुख के लम्हों को याद करके

हो इल्म उनको भी बेबसी का
पाकीज़ा उल्फत बर्बाद करके
तन्हाई दिल की करेगी बातें
देखिए खुद को नाशाद करके
ख़ुशी का दुगना मज़ा मिलेगा
देखो गम की फरियाद करके
ना छिप सकेगा असर उम्र का
जड़ी-बूटियों को इजाद करके
जिन्हें मुकदर ना रास आया
वो देखे मेहनत को याद करके
ना दे सकोगे फकीरों को कुछ
बेचैन दिल को फौलाद करके


Friday, 28 October 2011

हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ



मुफलिसी मेरी माँ थी स्वीकार करता हूँ
हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ

ज्यादा बड़ा अब भी वजूद नही है मेरा
फिर भी छोटा होने का इकरार करता हूँ
औकात की बात आप न करो तो अच्छा
मैं हैसियत वालों पे कम एतबार करता हूँ
शोहरत और दौलत मेरी नौकरानी होगी
मैं मन ही मन दोस्तों इंतजार करता हूँ
लगाकर दिल काँटों से कभी कभी बेचैन
मैं फूलों को भी अक्सर शर्मसार करता हूँ

Thursday, 27 October 2011

जमाना यहाँ बैंड बजा देगा कालिये तेरा



कसेंगे लोग अगर तंज़ तो मैं सह लूँगा
है बात तेरी बता क्या होगा कालिये तेरा

हूँ गब्बर सिंह मैं दिल का फ़िक्र ना कर
जमाना यहाँ बैंड बजा देगा कालिये तेरा
सभी को तुमने बसंती समझ कर घूरा है
आकर कोई भी रिमांड लेगा कालिये तेरा
लिहाज़ तो बेचकर तुम पहले ही खा चुके
दिल क्या क्या और बेचेगा कालिये तेरा
अब हाले दिल कौन पूछेगा कालिये तेरा

नहा कर ठंडे पानी से इश्क फरमा बेचैन
राहत गर्मी से मन पायेगा कालिये तेरा






दिमाग और दिल की बत्ती बुझा दूं मैं





कई बार सोचता हूँ तुझको भुला दूं मैं
दिमाग और दिल की बत्ती बुझा दूं मैं

जिक्र तक तुम्हारे पहुंचे न मुझ तलक
यादों के काफिले को रस्ता भुला दूं मैं
तन्हाई और महफ़िल से रिश्ता तोड़कर
जहाँ के रंजो गम में खुद को घुसा दूं मैं
कर दूंगा बाद में झुक कर तुम्हे सलाम
बुजदिल नही हूँ पहले सबको बता दूं मैं

बेचैन रहना हर घड़ी छुट जायेगा शायद
आईना हाँ इक दिन खुद को दिखा दूं मैं

Wednesday, 26 October 2011

जानता हूँ दीवाने और क्या करते है

जानता हूँ दीवाने और क्या करते है
महबूब की यादों का नशा करते है

किसी भी बहाने सज़ा मिलती ह
महोब्बत में जो लोग दगा करते है
मंदिरों में जाकर माथा रगड़ने वाले
वजूद की पत्थरों से चुगलियाँ करते है
जंग के साये कम से कम सयाने लोग
अमन और सलामती की दुआ करते है
ता-उम्र दुःख पाते हैं बेचैन वो लोग
हर किसी पर जो भरोसा करते है

बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे

दिल में किसी यारी का शोर ना हो तो अच्छा है
करम दोस्तों के अब और ना हो तो अच्छा है
ना सजे महफ़िलें और ना कही मैं शेर कहू
झूठी वाह-सुनने का दौर ना हो तो अच्छा है
झूठी है तो झूठ रहे होठों की मुस्कान मगर
धडकनों पे किसी का गौर ना हो तो अच्छा है
बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे
शबनम की कातिल भोर ना हो तो अच्छा है

देखा है परख कर  बेचैन , गैर-गैर ही निकले
अब दिल का कोई चितचोर ना हो तो अच्छा है

Tuesday, 25 October 2011

दिवाली पे तोहफा सबको ख़ास मिले



रौशनी,खुशखबरी और मिठास मिले
दिवाली पे तोहफा सबको ख़ास मिले

दुआ है हर आंगन में उतरें खुशियाँ
हर घर में मस्ती का अहसास मिले
किसी चीज़ को ना तरसे कभी कोई
अपने हिस्से का सबको आकाश मिले
खुलेगा पिटारा शोहरत और दौलत का
लक्ष्मी की और से सबको विश्वास मिले
इस्तकबाल करे कामयाबी हर काम में
दिक्कतों को सदा खातिर बनवास मिले

शौक बेशक सर चढ़कर कुछ बोले बेचैन
पर मजबूरी में ना किसी का उपवास मिले



Sunday, 23 October 2011

अब के दिवाली पर इक काम कीजिये

अब के दिवाली पर इक काम कीजिये
कुछ खर्चा मुफलिसों के नाम कीजिये

तकदीर समझ बैठे है जो अंधरों को
आप रौशनी का वहाँ इंतजाम कीजिये
कोरी मुबारकबाद में कुछ नही हासिल
थोडा सा मीठे का भी एहतराम कीजिये
महसूस करोगे सुकून मन में दोस्तों
पैर छूकर बुजुर्गों को प्रणाम कीजिये
दौडाके नजर अपने अपने इलाकों में
जरुरतमंदों की यादगार शाम कीजिये
गुप्त दान करने का जमाना जा चुका
जो आपको करना है सरेआम कीजिये
ता- उम्र काम आएगी समझ ले बेचैन
ना ख्वाइशों का खुद को गुलाम कीजिये

राम जाने किधर गया एक उल्लू का पठा



दिल लेके मुकर गया एक उल्लू का पठा
हाय कबाड़ा कर गया एक उल्लू का पठा
मेरी वजह से तन्हाइयों में बैठकर रोता है
इल्जाम सर धर गया एक उल्लू का पठा
आज चौपाल में बैठे लोग बतिया रहे थे
सुबह सवेरे मर गया एक उल्लू का पठा
वक्त ओ-नसीब ने थोडा साथ क्या दिया
कुछ ज्यादा संवर गया एक उल्लू का पठा
करके वादा ता-उम्र साथ देने का बेचैन
राम जाने किधर गया एक उल्लू का पठा

BECHAIN MAN JYA PAKISTAN

Saturday, 22 October 2011

जाके दरिया में गिरूंगा मैं नदी हूँ यारों



लोग कहते हैं मैं दीवाना कवि हूँ यारों
जाके दरिया में गिरूंगा मैं नदी हूँ यारों

हादसा हो या कोई बात भूलती ही नही
मैं तो इतिहास की यादगार कड़ी हूँ यारों
नही हो पा रही बंद मैं ऐसी फाइल हो गया
रोजाना तारीखों पर आके मैं खड़ी हूँ यारों
मैं अमीरों की भूख हूँ जो मिटती ही नही
गिद्ध की नजरों सी रुपयों पे गढ़ी हूँ यारों
मुझको समझेंगे वही जो भी बेचैन यहाँ
चैन वालों के लिए मैं अजनबी हूँ यारों



Friday, 21 October 2011

दिमाग पर यादों का भारी कैसे पलड़ा है



पूछूँगा खुदा मुझको गर मिल गये कभी
तदवीर और तकदीर में से कौन बड़ा हैं
क्यूं ता-उम्र सफर में ही रहता हैं आदमी
महफ़िल में होके भी कोई कैसे तनहा है
सीने में दिल,दिल में धडकने है लेकिन
रग रग में कोई बनके लहू क्यूं दौड़ता हैं
पलकों की मुंडेरों पे जुगनू बैठते है क्यूं
दिमाग पर यादों का भारी कैसे पलड़ा है
मालूम हो किसी को तो बताना हमें जरुर
क्यूं बेचैन जफा का हुश्न से गहरा नाता हैं

Thursday, 20 October 2011

मुझसे मिलना है तो मेरी बस्ती में आइए



ना हूजुर आप मतलब परस्ती में आइए
छोड़ कर गर्ज़ थोड़ी सी मस्ती में आइए
मैं कमल हूँ मिलूंगा कीचड़ में तुझको
मुझसे मिलना है तो मेरी बस्ती में आइए
दिलजले जाने क्या पूछ बैठेंगे तुझसे
हाय महफ़िल में ना तंगदस्ती में आइए
जान हैं तो जहाँ हैं बाद में होता रूतबा
बात को समझकर मेरी कश्ती में आइए
कुछ उम्र का भी तकाजा होता हैं बेचैन
इतनी जल्दी बड़ों की ना हस्ती में आइए

Wednesday, 19 October 2011

Songs.PK - Jagjit Singh,Parwaaz,Ghazals,Indian,Download Free Ghazals,Ghazals

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अपने दिमाग का खुद रकीब हूँ



सच पूछिए तो मैं बेहद गरीब हूँ
हालात से लड़ता हुआ नसीब हूँ
हर फैसला दिल पर छोड़ देता हूँ
अपने दिमाग का खुद रकीब हूँ
तन्हाई में खुद से बात करता हूँ
इसलिए मैं दूसरों से अजीब हूँ
निकलवा ही लेते हैं मुझसे काम
जिनके लिए मैं एक तरकीब हूँ
पसंद नही बकवासमंदो को बेचैन
उनके सर पर मैं लटकती सलीब हूँ

Tuesday, 18 October 2011

हमें तो हमारा ज़ज्बात खा गया



दिल के मामले में मात खा गया
हमें तो हमारा ज़ज्बात खा गया
इस कदर चालाक हैं महबूब मेरा
मिला तो काम की बात खा गया
सफर में एक छतरी थी दोनों पे
ना बरसा मौसम बरसात खा गया
करके बहाना फुर्सत न मिलने का
मेरे हिस्से की मुलाक़ात खा गया
हराम का उसे खाने की आदत थी
इसलिए वो मेरे ख्यालात खा गया
हद की भी हद होती हैं बेचैन
वो कैसे अपनी औकात खा गया

धडकन पर सबके पहरा मिलेगा



जख्म दिल का गहरा मिलेगा
हर आँख में इक चेहरा मिलेगा
ये अलग बात है कोई हाँ ना भरे
धडकन पर सबके पहरा मिलेगा
रूह खिल उठेगी जनाबे आली
जीत का जिस पल सेहरा मिलेगा
खुद पर ही भरोसा नही जिसका
उस शख्स का वक्त ठहरा मिलेगा
ना सोचा था दुआ के वक्त बेचैन
इस दौर का खुदा बहरा मिलेगा

Monday, 17 October 2011

मत पूछो कलाकारी ने छिना है क्या हमारा



कभी तालियों ने लूटा कभी शाबाशी ने मारा
मत पूछो कलाकारी ने छिना है क्या हमारा

शोहरत मैं मानता हूँ मिल ही गई हैं लेकिन
खाली नाम के ही दम पर होता नही गुज़ारा
तकलीफ दूसरों की हुआ देखकर दुखी पर
ज़ज्बातों में बहकर मिला फायदा क्या यारा
दुनिया है ये उसी की जो लूटे इसको हर पल
रखें ठोकरों के ऊपर सदा ईमान का पिटारा
वे जानता है पक्के गम और ख़ुशी की भाषा
जो चख चुके हैं यारों अश्कों का स्वाद खारा
कहने को हैं आसां करना हैं कितना मुश्किल
बस तूफानों से लड़ें वो चाहते हैं जो किनारा
बेचैन की गुज़ारिश हैं अगले जन्म में दाता
दिल सीने में ना देना होगा अहसान तुम्हारा

Sunday, 16 October 2011

करेंगे अब खुलासा करेंगे अब खुलासा



खैर नहीं सुन लो तुम्हारी भ्रस्त्ताचारियों
लड़ने की हो गई हैं तैयारी भ्रस्त्ताचारियों
करेंगे अब खुलासा करेंगे अब खुलासा ............................

भूखमरी खुदगर्जी जो तुमने फैलाई हैं
रिस्प्त्खोरी की जो तुमने हवा चलाई हैं
उस हवा पर नजर हमारी भ्रस्त्ताचारियों
करेंगे अब खुलासा, करेंगे अब खुलासा ............................

सबके सपने सच होंगे सबकी होगी जीत
रोज खुलासे होने से गूंजेंगे प्यार के गीत
 होगी छवि देश की न्यारी भ्रस्ताचारियों
करेंगे अब खुलासा, करेंगे अब खुलासा ............................

वसुधैव कुटुम्बकम का नारा सब लाओ
अन्ना जी की राह पकड देश के हो जाओ
अब जाग गई जनता सारी भ्रस्ताचारियों
करेंगे अब खुलासा, करेंगे अब खुलासा ............................

आओ शहीदों के सपनों को पूरा हम कर दें
भारत माँ की दुःख तकलीफें सारी ही हर दें
बेचैन होने की तुम्हारी बारी भ्र्स्ताचारियों
करेंगे अब खुलासा, करेंगे अब खुलासा ............................



एक प्यार स्कूली को खड़ा सामने पाता हूँ



बचपन से जवानी तक जब नजरें दौड़ाता हूँ
एक प्यार स्कूली को खड़ा सामने पाता हूँ

नही भूला हूँ दोनों ही हम उमर के कच्चे थे
अहसास में पर यारों हम बिलकुल सच्चे थे
बंद करता हूँ जब आँखें कही खो सा जाता हूँ
एक प्यार स्कूली को..................

उस जैसी सादगी और मुस्कान नही देखी
कहने को तो दुनिया में खूब निगाह फेंकी
हाय उसकी नजाकत पर सर को झुकाता हूँ
एक प्यार स्कूली को..................

रातों को उठ उठ कर मैंने रोकर भी देखा हैं
तन्हाइयों में सिसकी का होकर भी देखा हैं
नहीं कुछ भी हुआ हासिल यारों पछताता हूँ
एक प्यार स्कूली को..................

कितना ही मेरे दाता मेरे हिस्से कयामत दे
याददाश्त को भी बेशक कोई भी आफत दे
पर पाठ महोब्बत का नही भूलना चाहता हूँ
एक प्यार स्कूली को..................

नही बात अकेले की मैं सबकी करता हूँ
इल्जाम महोब्बत का हर सर पे धरता हूँ
यहाँ बेचैन हैं हर कोई सरेआम बताता हूँ
एक प्यार स्कूली को..................


Saturday, 15 October 2011

वो आता हैं याद चाहे बुढ़ापे में आये


रूह से चिपक जाता हैं उतरता नहीं हैं
इश्कियां भूत जीते जी मरता नहीं हैं
कितना ही पुराना हो जख्मे-महोब्बत
पूरी तरह से यह कभी भरता नहीं हैं
लफ्जों से झलक जाता हैं हाले-दिल
चेहरा आइना हैं कभी मुकरता नहीं हैं
वो आता हैं याद चाहे बुढ़ापे में आये
यादों का नश्तर रहम करता नहीं हैं
हर आँख में हैं मौत का खौफ बेचैन
किसने कहा की वो कभी डरता नही हैं

दाम्पत्य में सुखी जीवन का साधारण सा राज़...............................

खुद को शेर समझो...
........................और.................
......................बीवी को......................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................
.........
शेरोंवाली .....हैप्पी करवा चौथ.....

तेरी आँख में तस्वीर अपनी क्या देखी



तन भीगने से तुमने बचा लिया बेशक
मन भिगों गई बरसात क्या करूं बता
रह रहकर ख्याल तुम्हारा ही आ रहा हैं
मेरे बस में नही ज़ज्बात क्या करूं बता
कह तो दिया तुम बिन अब जीना क्या
तुम समझते नही बात क्या करूं बता
तेरी आँख में तस्वीर अपनी क्या देखी
छुट गया आईने का साथ क्या करूं बता
तुम दे दो जवाब तो बन जाएँ लाजवाब
वरना हैं वही सवालात क्या करूं बता
इश्क लडाना आता तो बेचैन ना होता
यही पर खाता हूँ मात क्या करूं बता


Friday, 14 October 2011

CHAND UGA HAIN ZMI PE YAA AASMAAN PE करवा चौथ पर आप सबके लिए वी एम बेचैन द्वारा लिखा गया एक पैरोडी गीत

एक दिल हम सीने में एक घर छोड़ते है





यूं तो पत्नी पर इल्जाम ना लगाओ यारो
उनसा कोई ओर है तो सामने लाओ यारो

एक दिल हम सीने में एक घर छोड़ते है
यदि में गलत हूँ तो गलत ठहराओ यारो
तुम्हरे बच्चे पाल दिए घर सम्भाल लिया
मेहरबानी ये मिटटी में ना मिलाओ यारो

अब भी गर भ्रम है तो तलाक देकर देखो
फिर रसोई के रस्ते मैदान में आओ यारो
ढूंढते हो जिस महबूब की आँखों में प्यार
उस प्यार पर चिल्लाकर तो दिखाओ यारो

पत्नी से बड़ी माँ तो कोई होती नही बेचैन
अपनी नही तो बच्चो की तो बनाओ यारो