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Thursday, 17 November 2011

अब तो लड़ेंगे यारों आखरी दम तक


जब पहुँच गये है जिंदगी के खम तक
अब तो लड़ेंगे यारों आखरी दम तक

अपनी मौत को तो मौत आने से रही
आजमाकर तो देखे खुद को भ्रम तक

क्या बिगाड़ लेगी दुश्मन की तरकीब
कोई वार ही जब ना पहुंचेगा हम तक

मिटा देगी आदम ज़ात को मजहबी जंग
मत नफरत बिछाईएगा दैरो हरम तक

यूं ही नही खुल जाते जन्नत के दरवाजे
खुदा नापकर देखते है बेचैन करम तक

जिसने काटे हो कभी मुफलिसी के कुत्ते दिन

गरीबों का हमदर्द तो वही शख्स बन पायेगा
जिसने काटे हो कभी मुफलिसी के कुत्ते दिन

अर्श पर ले जाकर बेशक बैठा दो औकात
भूल कर तो दिखाओ जिंदगी के कुत्ते दिन

अपनी हस्ती पर दोस्त ना इतरा इस कदर
जाने कब आ जाएँ आदमी के कुत्ते दिन

मैंने भी महोब्बत करके देखी है दोस्तों
बहुत रुलाते है बेबसी के कुत्ते दिन

ध्यान से उठाना दुःख की तोहमत बेचैन
इतिहास बन जाते है गमी के कुत्ते दिन

Wednesday, 16 November 2011

चुगली समझता हूँ मैल ख्यालात का

समझ गया हूँ खेल है सारा जज्बात का
अब नही मानता मैं बुरा किसी बात का

बेशक कितनी करें बुराई मेरी दुश्मन
चुगली समझता हूँ मैल ख्यालात का

दिन के उजाले में ही होता है सब कुछ
अब इंतजार नही करता कोई रात का

तंज़ कसने वालों से ही सवाल है मेरा
कितना कद होना चाहिए औकात का

कमीन हर हाल में कमीन कहलायेगा
बेशक लबादा ओढ़ता हो मेरी ज़ात का

वो कल क्या करेगा इसकी फ़िक्र छोडो
जमाना है आजकल नगद करामात का

अगली दफा वो ही बाज़ी मारेगा बेचैन
जिसके समझ आया मतलब मात का

Monday, 14 November 2011

असली अंदाज़ में आकर मां-माँ कर दूं

सोचता हूँ आज पीकर हंगामा कर दूं
कई दिन हुवे मोहल्ले में ड्रामा कर दूं

दो-दो पैग देकर गली के सब बुढो को
मस्ती का पैदा एक कारनामा कर दूं

बहुत कान ऐंठे है बचपन से फूफा ने
क्यूं ना नशे में उसको मामा कर दूं

सच में अगर वो भी भूल गया है मुझे
खत्म यादों को खरामा-खरामा कर दूं

भूलके शर्म लिहाज़ पीने के बाद बेचैन
असली अंदाज़ में आकर मां-माँ  कर दूं


Sunday, 13 November 2011

हमजुबां से खुदा मुझको मिलाता क्यूं नही


कोई मजबूरी है तो मुझे बताता क्यूं नही
वो मेरी तरह यारी में पेश आता क्यूं नही

शक है मुझे समझकर भी नही समझा वो
समझ गया तो ढंग से समझाता क्यूं नही

दांतों तले ऊँगली दबाना तो छुट गया पीछे
मुझको देखकर अब वो शरमाता क्यूं नही

डालकर ख़ाक मेरी बरसों की दीवानगी पर
मेरी हालत पर थोडा रहम खाता क्यूं नही

टकरा ही जाते है बेचैन हर बार दुसरे लोग
हमजुबां से खुदा मुझको मिलाता क्यूं नही


वो दोस्ती से पहले मुखबरी करता है

वो दोस्ती से पहले मुखबरी करता है
तब जाकर अपना शक बरी करता है

करके चिकनी चुपड़ी बातें कमबख्त
मौका मिलते ही वो जादूगरी करता है

हर कदम हर रिश्ते से फरेब मिला है
वो इसलिए बात खोटी-खरी करता हैं

माँ का दर्दे दिल महसूस नही है जिसे
बेटा फिर बेकार ही अफसरी करता है


वो उतना ही शातिर निकलेगा बेचैन
जो जितनी जुबान रसभरी करता है

Saturday, 12 November 2011

ख्वाबों को बच्चे समझ पालता ही रहा

मेरा सब्र गेंद की तरह उछालता ही रहा
कल के नाम पर वो मुझे टालता ही रहा

न मालूम था नही हो पाएंगे कभी जवां
ख्वाबों को बच्चे समझ पालता ही रहा

दुबारा टूटे तमाम भ्रम एक-एक करके
दोस्ती में इस बार भी मुगालता ही रहा

इससे ज्यादा ना और कुछ कर सका मैं
बस गजलों पर भडास निकालता ही रहा

जवां होते ही मिला था जो दर्द यारों से
मुझको उमर भर बेचैन सालता ही रहा

Friday, 11 November 2011

आंसू न मेरी तरह किसी के तेज़ाब हो


इतना भी ना सोचो की दिमाग खराब हो
सवाल उलझते-उलझते लाजवाब हो

रोजाना खुदा से दुआ ये मांगता हूँ मैं
ना मेरे हाथों आज कोई भी अजाब हो

दिवार बटवारे की अगर नही चाहते हो
भाई से भाई का ना कोई हिसाब हो

आँखों की नमी दिलजला देती है बना
आंसू न मेरी तरह किसी के तेज़ाब हो

इतनी मेहर करना खुदा हम दीवानों पर
हालत ना इश्क में कभी भी इज़्तिराब हो

बेटी ही महकाती है घर और आंगन को
बेचैन ऐसा सबके हिस्से में गुलाब हो

Thursday, 10 November 2011

आग और पानी का किसको शौक है

होश औकात ना भूले इसलिए पीता हूँ
वरना खारे पानी का किसको शौक है

वो तो व्यापार में शर्त होती है वरना
अक्सर बेईमानी का किसको शौक है

बात मेरी नही किसी से भी पूछ लीजे
झूठी मेहरबानी का किसको शौक है

अय्यासी के मारे ही बतायेंगे यह सब
ना मुराद जवानी का किसको शौक है

छिपी नही बुजुर्गों से यह बात बेचैन
आग और पानी का किसको शौक है

भीड़ के कंधे चढ़ इन्कलाब कोई मत देखना

मरने से पहले माँ मुझे समझा कर गई थी
रिश्तेदारों के भरोसे ख्वाब कोई मत देखना

करना हो कभी जो, अपने बूते पर ही करना
भीड़ के कंधे चढ़ इन्कलाब कोई मत देखना

आँखों में ही नही दिल भी दिक्कत में होगा
एकटक कभी भी आफताब कोई मत देखना

वो शादीशुदा है बडेपन का भ्रम ना रखेगा
कभी छोटे भाई से हिसाब कोई मत देखना

अच्छी आदतें देखेगा तो सुख पायेगा बेचैन
दोस्तों की अदा कभी खराब कोई मत देखना

Wednesday, 9 November 2011

रोजाना माँ के पैरों में सर झुका लेता हूँ

बचूंगा तो नही फिर भी आजमा लेता हूँ
सितमगर के नाम पर ज़हर खा लेता हूँ

जब भी आया है कोई ख़ास चेहरा सामने
एक बारगी देखकर आँखे झुका लेता हूँ

यारों की महोब्बत का कमाल है वरना
मैं तो नही मानता मैं अच्छा गा लेता हूँ

यूं करता हूँ इबादत की रस्म अदायगी
रोजाना माँ के पैरों में सर झुका लेता हूँ

नही मालूम कब बनती है अच्छी गजल
मैं कलम तो बेचैन रोजाना चला लेता हूँ

अब नही निकलते चिरागों से जिन्न

 माँ और गरीबी को जिसने भुलाया है
बुलंदी से वो शख्स जमीं पर आया है

खूब खाता है रिश्तेदारों से गालियाँ
औकात को जिसने कच्चा चबाया है

निखरी है और भी उसकी कामयाबी
बुजुर्गों से जिसने आशीर्वाद पाया है

वक्त के इंतिहान में मार गया बाज़ी
नसीब को जिसने आइना दिखाया है

अब नही निकलते चिरागों से जिन्न
जो जान गया उसने कमाकर खाया है

वो संस्कारों को पटरी से उतरें है बेचैन
औलाद को जिसने सर पर चढ़ाया है



Monday, 7 November 2011

पीके होश वालो की चुगली खाता हूँ

अक्सर नशे का मजा यूं उठाता हूँ
पीके होश वालो की चुगली खाता हूँ

कर देता हूँ खाली एक घूँट में जाम
चुश्कियों के झंझट से जी चुराता हूँ

काम तो करना है जिंदगी भर दोस्तों
छुटी के दिन सिर्फ आराम फरमाता हूँ

बहुत से लोगों का मैं दुश्मन हूँ मगर
नही जानता मैं किस किसको भाता हूँ

सीने में इक दर्द सा महसूस करता हूँ 
जब कभी तुम्हारी यादों से टकराता हूँ

मौत से टकराने का हौशला है तो मगर
अपने आप से यारों मैं बेहद घबराता हूँ

ब्याज तक डकारता हूँ व्यपार में मगर
झूठी कसम मैं बेचैन कभी नही खाता हूँ


कुनबा भी बनेगा पाप का चश्मदीद

सच में गर चाहते हो खुदा का दीद
बकरा काट कर ना बनाओ बकरीद

मस्जिद की जगह घर में मकतल
कैसे हो भाई तुम मजहब के मुरीद

मारकर बेकसूर को खुद तो फसोगे
कुनबा भी बनेगा पाप का चश्मदीद


मांस की जगह सबको मिठाई बांटो
फिर कहो आपस में मुबारक हो ईद


दुखाकर किसी गरीब का दिल बेचैन
ना पीढ़ियों के लिए तकलीफें खरीद

Sunday, 6 November 2011

मजदूर का बेटा बेरोज़गार निकला

वो उम्मीद की हदों से पार निकला
मेरे रकीबों का पक्का यार निकला

देता रहा दिलासे पर दिलासा मुझे
वो बहानेबाजों का सरदार निकला

खबरें सम्पादक के दिल से गुजरी
जब भी छप कर अखबार निकला
दर्द आंसू और बेबसी का जानकार
आदमी नही एक कलाकार निकला

गरीबी के कंधे चढ़कर पढने पर भी
मजदूर का बेटा बेरोज़गार निकला



मुझे देखे बिना बेचैन होने वाले का
अहसास ही बाद में व्यपार निकला

Saturday, 5 November 2011

वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

औकात भूलकर भी वो शरमाता नही है
अजब शख्स है वजूद से घबराता नही है

खा खाकर झूठी कसमें सेहत बना गया
रोटी पे कमबख्त कभी ललचाता नही है

मिलते ही बताता है ख्यालात बड़े- बड़े
गरीबी के दिनों का जिक्र उठाता नही है

खबरों में उसने होने का यूं जिक्र किया
जैसे अखबार मेरे घर कभी आता नही है

अब समझा उसके व्यवहार की कंगाली
वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

वो तो पिछली सदी की शुरुआत थी यारों
आजकल अच्छे इन्सां खुदा बनाता नही है

सब तदबीर-ओ-तकदीर का खेल है बेचैन
जगत में कोई किसी का भी विधाता नही है



Sunday, 30 October 2011

भीड़ पर भी यकीन हुआ पर

कसम खुदा की मैं रो पडूंगा
गर ना मुडके तू पास आया

नसीब में क्यूं मेरे ही यारों
गम में डूबा अहसास आया
दिखलाता मैं परवाज़ अपनी
पर ना हिस्से आकाश आया
भीड़ पर भी यकीन हुआ पर
ना रिश्तों पर विश्वास आया
सच कहूं इस जन्म में बेचैन
ना इश्क हमको रास आया

दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते




मुझे मुनीमों की क्या जरूरत
दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते

अपने जरूरी काम भूलकर भी
याद मेरा वो हर ख्वाब रखते
हो चाहे चुगली बनाम बेशक
वो चर्चा मेरी बेहिसाब रखते
नशे की हद तक गुजरते है वो
जो जाम के संग कबाब रखते
ना यादें इतना महकती उनकी
ना किताबों में जो गुलाब रखते
निहाल होते डूबकर दोनों बेचैन
जो नसीब में कोई चनाब रखते

Saturday, 29 October 2011

जिन्हें मुकदर ना रास आया



खुदा करे वो भी रोये छिपकर
सुख के लम्हों को याद करके

हो इल्म उनको भी बेबसी का
पाकीज़ा उल्फत बर्बाद करके
तन्हाई दिल की करेगी बातें
देखिए खुद को नाशाद करके
ख़ुशी का दुगना मज़ा मिलेगा
देखो गम की फरियाद करके
ना छिप सकेगा असर उम्र का
जड़ी-बूटियों को इजाद करके
जिन्हें मुकदर ना रास आया
वो देखे मेहनत को याद करके
ना दे सकोगे फकीरों को कुछ
बेचैन दिल को फौलाद करके


Friday, 28 October 2011

हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ



मुफलिसी मेरी माँ थी स्वीकार करता हूँ
हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ

ज्यादा बड़ा अब भी वजूद नही है मेरा
फिर भी छोटा होने का इकरार करता हूँ
औकात की बात आप न करो तो अच्छा
मैं हैसियत वालों पे कम एतबार करता हूँ
शोहरत और दौलत मेरी नौकरानी होगी
मैं मन ही मन दोस्तों इंतजार करता हूँ
लगाकर दिल काँटों से कभी कभी बेचैन
मैं फूलों को भी अक्सर शर्मसार करता हूँ