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Saturday, 5 November 2011

वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

औकात भूलकर भी वो शरमाता नही है
अजब शख्स है वजूद से घबराता नही है

खा खाकर झूठी कसमें सेहत बना गया
रोटी पे कमबख्त कभी ललचाता नही है

मिलते ही बताता है ख्यालात बड़े- बड़े
गरीबी के दिनों का जिक्र उठाता नही है

खबरों में उसने होने का यूं जिक्र किया
जैसे अखबार मेरे घर कभी आता नही है

अब समझा उसके व्यवहार की कंगाली
वो दौलत के इलावा कुछ कमाता नही है

वो तो पिछली सदी की शुरुआत थी यारों
आजकल अच्छे इन्सां खुदा बनाता नही है

सब तदबीर-ओ-तकदीर का खेल है बेचैन
जगत में कोई किसी का भी विधाता नही है



Sunday, 30 October 2011

भीड़ पर भी यकीन हुआ पर

कसम खुदा की मैं रो पडूंगा
गर ना मुडके तू पास आया

नसीब में क्यूं मेरे ही यारों
गम में डूबा अहसास आया
दिखलाता मैं परवाज़ अपनी
पर ना हिस्से आकाश आया
भीड़ पर भी यकीन हुआ पर
ना रिश्तों पर विश्वास आया
सच कहूं इस जन्म में बेचैन
ना इश्क हमको रास आया

दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते




मुझे मुनीमों की क्या जरूरत
दुश्मन ही मेरा हिसाब रखते

अपने जरूरी काम भूलकर भी
याद मेरा वो हर ख्वाब रखते
हो चाहे चुगली बनाम बेशक
वो चर्चा मेरी बेहिसाब रखते
नशे की हद तक गुजरते है वो
जो जाम के संग कबाब रखते
ना यादें इतना महकती उनकी
ना किताबों में जो गुलाब रखते
निहाल होते डूबकर दोनों बेचैन
जो नसीब में कोई चनाब रखते

Saturday, 29 October 2011

जिन्हें मुकदर ना रास आया



खुदा करे वो भी रोये छिपकर
सुख के लम्हों को याद करके

हो इल्म उनको भी बेबसी का
पाकीज़ा उल्फत बर्बाद करके
तन्हाई दिल की करेगी बातें
देखिए खुद को नाशाद करके
ख़ुशी का दुगना मज़ा मिलेगा
देखो गम की फरियाद करके
ना छिप सकेगा असर उम्र का
जड़ी-बूटियों को इजाद करके
जिन्हें मुकदर ना रास आया
वो देखे मेहनत को याद करके
ना दे सकोगे फकीरों को कुछ
बेचैन दिल को फौलाद करके


Friday, 28 October 2011

हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ



मुफलिसी मेरी माँ थी स्वीकार करता हूँ
हां आज भी मैं गरीबी से प्यार करता हूँ

ज्यादा बड़ा अब भी वजूद नही है मेरा
फिर भी छोटा होने का इकरार करता हूँ
औकात की बात आप न करो तो अच्छा
मैं हैसियत वालों पे कम एतबार करता हूँ
शोहरत और दौलत मेरी नौकरानी होगी
मैं मन ही मन दोस्तों इंतजार करता हूँ
लगाकर दिल काँटों से कभी कभी बेचैन
मैं फूलों को भी अक्सर शर्मसार करता हूँ

Thursday, 27 October 2011

जमाना यहाँ बैंड बजा देगा कालिये तेरा



कसेंगे लोग अगर तंज़ तो मैं सह लूँगा
है बात तेरी बता क्या होगा कालिये तेरा

हूँ गब्बर सिंह मैं दिल का फ़िक्र ना कर
जमाना यहाँ बैंड बजा देगा कालिये तेरा
सभी को तुमने बसंती समझ कर घूरा है
आकर कोई भी रिमांड लेगा कालिये तेरा
लिहाज़ तो बेचकर तुम पहले ही खा चुके
दिल क्या क्या और बेचेगा कालिये तेरा
अब हाले दिल कौन पूछेगा कालिये तेरा

नहा कर ठंडे पानी से इश्क फरमा बेचैन
राहत गर्मी से मन पायेगा कालिये तेरा






दिमाग और दिल की बत्ती बुझा दूं मैं





कई बार सोचता हूँ तुझको भुला दूं मैं
दिमाग और दिल की बत्ती बुझा दूं मैं

जिक्र तक तुम्हारे पहुंचे न मुझ तलक
यादों के काफिले को रस्ता भुला दूं मैं
तन्हाई और महफ़िल से रिश्ता तोड़कर
जहाँ के रंजो गम में खुद को घुसा दूं मैं
कर दूंगा बाद में झुक कर तुम्हे सलाम
बुजदिल नही हूँ पहले सबको बता दूं मैं

बेचैन रहना हर घड़ी छुट जायेगा शायद
आईना हाँ इक दिन खुद को दिखा दूं मैं

Wednesday, 26 October 2011

जानता हूँ दीवाने और क्या करते है

जानता हूँ दीवाने और क्या करते है
महबूब की यादों का नशा करते है

किसी भी बहाने सज़ा मिलती ह
महोब्बत में जो लोग दगा करते है
मंदिरों में जाकर माथा रगड़ने वाले
वजूद की पत्थरों से चुगलियाँ करते है
जंग के साये कम से कम सयाने लोग
अमन और सलामती की दुआ करते है
ता-उम्र दुःख पाते हैं बेचैन वो लोग
हर किसी पर जो भरोसा करते है

बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे

दिल में किसी यारी का शोर ना हो तो अच्छा है
करम दोस्तों के अब और ना हो तो अच्छा है
ना सजे महफ़िलें और ना कही मैं शेर कहू
झूठी वाह-सुनने का दौर ना हो तो अच्छा है
झूठी है तो झूठ रहे होठों की मुस्कान मगर
धडकनों पे किसी का गौर ना हो तो अच्छा है
बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे
शबनम की कातिल भोर ना हो तो अच्छा है

देखा है परख कर  बेचैन , गैर-गैर ही निकले
अब दिल का कोई चितचोर ना हो तो अच्छा है

Tuesday, 25 October 2011

दिवाली पे तोहफा सबको ख़ास मिले



रौशनी,खुशखबरी और मिठास मिले
दिवाली पे तोहफा सबको ख़ास मिले

दुआ है हर आंगन में उतरें खुशियाँ
हर घर में मस्ती का अहसास मिले
किसी चीज़ को ना तरसे कभी कोई
अपने हिस्से का सबको आकाश मिले
खुलेगा पिटारा शोहरत और दौलत का
लक्ष्मी की और से सबको विश्वास मिले
इस्तकबाल करे कामयाबी हर काम में
दिक्कतों को सदा खातिर बनवास मिले

शौक बेशक सर चढ़कर कुछ बोले बेचैन
पर मजबूरी में ना किसी का उपवास मिले



Sunday, 23 October 2011

अब के दिवाली पर इक काम कीजिये

अब के दिवाली पर इक काम कीजिये
कुछ खर्चा मुफलिसों के नाम कीजिये

तकदीर समझ बैठे है जो अंधरों को
आप रौशनी का वहाँ इंतजाम कीजिये
कोरी मुबारकबाद में कुछ नही हासिल
थोडा सा मीठे का भी एहतराम कीजिये
महसूस करोगे सुकून मन में दोस्तों
पैर छूकर बुजुर्गों को प्रणाम कीजिये
दौडाके नजर अपने अपने इलाकों में
जरुरतमंदों की यादगार शाम कीजिये
गुप्त दान करने का जमाना जा चुका
जो आपको करना है सरेआम कीजिये
ता- उम्र काम आएगी समझ ले बेचैन
ना ख्वाइशों का खुद को गुलाम कीजिये

राम जाने किधर गया एक उल्लू का पठा



दिल लेके मुकर गया एक उल्लू का पठा
हाय कबाड़ा कर गया एक उल्लू का पठा
मेरी वजह से तन्हाइयों में बैठकर रोता है
इल्जाम सर धर गया एक उल्लू का पठा
आज चौपाल में बैठे लोग बतिया रहे थे
सुबह सवेरे मर गया एक उल्लू का पठा
वक्त ओ-नसीब ने थोडा साथ क्या दिया
कुछ ज्यादा संवर गया एक उल्लू का पठा
करके वादा ता-उम्र साथ देने का बेचैन
राम जाने किधर गया एक उल्लू का पठा

BECHAIN MAN JYA PAKISTAN

Saturday, 22 October 2011

जाके दरिया में गिरूंगा मैं नदी हूँ यारों



लोग कहते हैं मैं दीवाना कवि हूँ यारों
जाके दरिया में गिरूंगा मैं नदी हूँ यारों

हादसा हो या कोई बात भूलती ही नही
मैं तो इतिहास की यादगार कड़ी हूँ यारों
नही हो पा रही बंद मैं ऐसी फाइल हो गया
रोजाना तारीखों पर आके मैं खड़ी हूँ यारों
मैं अमीरों की भूख हूँ जो मिटती ही नही
गिद्ध की नजरों सी रुपयों पे गढ़ी हूँ यारों
मुझको समझेंगे वही जो भी बेचैन यहाँ
चैन वालों के लिए मैं अजनबी हूँ यारों



Friday, 21 October 2011

दिमाग पर यादों का भारी कैसे पलड़ा है



पूछूँगा खुदा मुझको गर मिल गये कभी
तदवीर और तकदीर में से कौन बड़ा हैं
क्यूं ता-उम्र सफर में ही रहता हैं आदमी
महफ़िल में होके भी कोई कैसे तनहा है
सीने में दिल,दिल में धडकने है लेकिन
रग रग में कोई बनके लहू क्यूं दौड़ता हैं
पलकों की मुंडेरों पे जुगनू बैठते है क्यूं
दिमाग पर यादों का भारी कैसे पलड़ा है
मालूम हो किसी को तो बताना हमें जरुर
क्यूं बेचैन जफा का हुश्न से गहरा नाता हैं

Thursday, 20 October 2011

मुझसे मिलना है तो मेरी बस्ती में आइए



ना हूजुर आप मतलब परस्ती में आइए
छोड़ कर गर्ज़ थोड़ी सी मस्ती में आइए
मैं कमल हूँ मिलूंगा कीचड़ में तुझको
मुझसे मिलना है तो मेरी बस्ती में आइए
दिलजले जाने क्या पूछ बैठेंगे तुझसे
हाय महफ़िल में ना तंगदस्ती में आइए
जान हैं तो जहाँ हैं बाद में होता रूतबा
बात को समझकर मेरी कश्ती में आइए
कुछ उम्र का भी तकाजा होता हैं बेचैन
इतनी जल्दी बड़ों की ना हस्ती में आइए

Wednesday, 19 October 2011

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अपने दिमाग का खुद रकीब हूँ



सच पूछिए तो मैं बेहद गरीब हूँ
हालात से लड़ता हुआ नसीब हूँ
हर फैसला दिल पर छोड़ देता हूँ
अपने दिमाग का खुद रकीब हूँ
तन्हाई में खुद से बात करता हूँ
इसलिए मैं दूसरों से अजीब हूँ
निकलवा ही लेते हैं मुझसे काम
जिनके लिए मैं एक तरकीब हूँ
पसंद नही बकवासमंदो को बेचैन
उनके सर पर मैं लटकती सलीब हूँ

Tuesday, 18 October 2011

हमें तो हमारा ज़ज्बात खा गया



दिल के मामले में मात खा गया
हमें तो हमारा ज़ज्बात खा गया
इस कदर चालाक हैं महबूब मेरा
मिला तो काम की बात खा गया
सफर में एक छतरी थी दोनों पे
ना बरसा मौसम बरसात खा गया
करके बहाना फुर्सत न मिलने का
मेरे हिस्से की मुलाक़ात खा गया
हराम का उसे खाने की आदत थी
इसलिए वो मेरे ख्यालात खा गया
हद की भी हद होती हैं बेचैन
वो कैसे अपनी औकात खा गया

धडकन पर सबके पहरा मिलेगा



जख्म दिल का गहरा मिलेगा
हर आँख में इक चेहरा मिलेगा
ये अलग बात है कोई हाँ ना भरे
धडकन पर सबके पहरा मिलेगा
रूह खिल उठेगी जनाबे आली
जीत का जिस पल सेहरा मिलेगा
खुद पर ही भरोसा नही जिसका
उस शख्स का वक्त ठहरा मिलेगा
ना सोचा था दुआ के वक्त बेचैन
इस दौर का खुदा बहरा मिलेगा