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Friday, 14 October 2011

हिज्र ना किसी के लिए तेज़ाब बने



इधर उधर बिखरे हैं यादों के पन्ने
मिलें तुम्हारा साथ तो किताब बने
काश महोब्बत में सारे दर्दे दिल का
परचून जैसा अपना भी हिसाब बने
सोहनी को लेकर फिक्रमंद हूँ इतना
डूब जाऊं गर अश्कों की चनाब बने
रूह तक जलाकर ख़ाक कर देता हैं
हिज्र ना किसी के लिए तेज़ाब बने
दौर कैसा भी आये इश्क में बेचैन
ना किसी की हालत इज़्तिराब बने 










शक्ल देखकर कोई भ्रम ना पाल



पहले जैसा अब जमाना नही हैं
मुकरने का कोई बहाना नहीं हैं
किसी भी बात से फिर सकते हो
जुबां सच्चाई का पैमाना नहीं हैं
दिल में सभी के होती हैं हलचल
इक शख्स बता जो दीवाना नहीं हैं
ओरों की तफ्तीश वो क्या करेगा
खुद को जिसने पहचाना नहीं हैं
जाम से नहीं तो आँखों से पी लो
दूर तुमसे कोई मयखाना नहीं हैं
शक्ल देखकर कोई भ्रम ना पाल
मिजाज मेरा आशिकाना नहीं हैं
बारहा आईने आगे वो जाएँ बेचैन
जिसका का भी चेहरा पुराना नहीं हैं

Wednesday, 12 October 2011

जल्दी में तो बोतल भी नही खोलता




कहते हैं लोग पीकर ड्रामा करता हूँ
दो पैग लगाते ही हंगामा करता हूँ
यूं ही गिनते हैं मुझे पीने वालों में
मैं तो शराब से रामा रामा करता हूँ
ढलते ही साँझ दोस्त खौफ खाते हैं
इल्जाम है की कारनामा करता हूँ
जल्दी में तो बोतल भी नही खोलता
जो करना हैं खरामा खरमा करता हूँ
ये तो बे-इंतिहा पिलाने वाले जाने
क्यूं बेचैन नशे में मां मां करता हूँ

Monday, 10 October 2011

गजल गायक जगजीत सिंह के निधन पर एक गजल दर्द का आभास छूट गया हमसे



मखमली अहसास छूट गया हमसे
शख्स कोई खास छूट गया हमसे
ग़ज़लें दुल्हन हैं तो दुल्हा था वो
मन का विश्वास छूट गया हमसे
जब भी सुनते थे मिलता था चैन
दर्द का आभास छूट गया हमसे
कौन मिलवायेगा दिल को दिल से
रिश्तों का "पास" छूट गया हमसे
कैसे गुजरेगी जिंदगी अब बेचैन
सच्चा इखलास छूट गया हमसे







Sunday, 9 October 2011

सितमगर से यारी हैं इन दिनों



मन थोडा सा भारी हैं इन दिनों
सितमगर से यारी हैं इन दिनों
कहने को तो सब ठीक हैं मगर
हल्की सी बेकरारी हैं इन दिनों
हार जीत की बात करते हैं सभी
हरेक शख्स जुआरी हैं इन दिनों
अपना तो जिक्र उठता ही नही
चर्चाए ही तुम्हारी हैं इन दिनों
फरेब से कोई बचकर दिखाए
हर तरफ कलाकारी हैं इन दिनों
काम पड़ने पर गधा बाप बना लो
यही तो दुनियादारी हैं इन दिनों
चैन नही बेचैन उसके बिना अब
अपनी यही लाचारी हैं इन दिनों

यहाँ क्या मैं ही बेचैन हूँ



शर्मिंदा हूँ किसी बात से
नही सोया हूँ कई रात से
हुआ जाने कैसे हादसा
अनचाही सी मुलाक़ात से
वो जवाब ऐसा ही दे गये
डरता हूँ अब सवालात से
रह जाता हूँ बस कांप कर
हाय इश्क के ख्यालात से
तुझे जीते जी मरवा देगा
नही यारी रख ज़ज्बात से

वो किसकी जुल्फें संवारेगा
जो उलझ रहा हो हालात से
यहाँ क्या मैं ही  बेचैन हूँ
कोई पूछ दे कायनात से

अनछुए ज़ज्बात है अभी



साधारण सी बात है अभी
कच्ची मुलाकात है अभी
दिल का हाल कैसे कह दूं
अनछुए ज़ज्बात है अभी
कैसे आयें इक छतरी नीचे
हल्की सी बरसात है अभी
वो होंगे धुरंधर इश्क में
मेरी तो शुरुआत है अभी
पकड़ हाथ सीने पर रखूं
मेरी कहाँ औकात है अभी
जवाब मिलते ही बताऊंगा
जिंदगी सवालात है अभी 
दिन ही तो गुज़रा है बेचैन
पहाड़ सी बाकि रात है अभी

दिल के इलावा चैन भी खोकर तो देखिये



शर्मिंदगी को माफ़ी से धोकर तो देखिये
मिलेगा शकुं तन्हाई में रोकर तो देखिये
पाने का छोड़कर लालच कभी मेरे हूजुर
दिल के इलावा चैन भी खोकर तो देखिये
मिल जायेंगे सवालों के सारे जवाब भी
अहसास के जंगल से भी होकर तो देखिये
हंसने का जब मन करे बिन बात आपका
तस्वीर मेरी में कोई भी जोकर तो देखिये
मेरी तरह से आप भी दिल ही दिल में
सपना कोई भी पहले संजोकर तो देखिये
हर वक्त जागे जागे ना रहा करो बेचैन जी
ख्वाबों में आऊंगा कभी सोकर तो देखिये



Saturday, 8 October 2011

उम्र को भी पछाड़ के रख दिया



हर अदा में छिपे हैं सौ-सौ राज
क्या लगाऊं अदाओं का अंदाज़
एक दफा जो भी मिल लें तुझसे
हो जाये है उसका दिल दगाबाज़
असर है तेरी खिलखिलाहट का
नींद में सुनता हूँ हंसी की आवाज़ 
उम्र को भी पछाड़ के रख दिया
बता तो दीजियेगा क्या है राज़
जिसे देखो वो ही बेचैन हुआ है
मान गये तुझको वाह मुमताज़

Wednesday, 5 October 2011

गुलों की खुशबू जिस्म में पुरजोर लाये हो



इतनी  सादगी कहाँ से बटोर लायें हो
लगता है खुदा के यहाँ से चोर लाये हो
शर्मों-हया से पलकें झुका कर चलना
हंसने की अदा काबिले गौर लाये हो
क्यूंकर ना परेशां हो देखकर वो चाँद
जुल्फों के साए में चेहरा चकोर लाये हो
देखकर महफ़िल में हर कोई कह रहा है
जुल्फें नही ज़ालिम रेशम की डोर लाये हो
सुनते ही लगे झूमने लोग होकर दीवाने
सावन के महीने का पायल में शोर लाये हो
हर कोई तुम्हारी और खिंचा जा रहा है
गुलों की खुशबू जिस्म में पुरजोर लाये हो
क्यूंकर ना बढ़े धडकने देखकर बेचैन
तवज्जो आज अपना मेरी ओर लाये हो

Monday, 3 October 2011

मन्दिरों में जाकर कभी माथा नही रगड़ता



मैं बहुत कम लोगों से मुलाक़ात करता हूँ
जिनसे याराना हो उन्ही से बात करता हूँ
कहने को तो आती है मुझे जादूगरी मगर
ना दोस्तों के साथ कोई करामात करता हूँ
बस सीख ही नही पाया टालने की आदत
सब फैंसले मैं दोस्तों हाथों हाथ करता हूँ
मन्दिरों में जाकर कभी माथा नही रगड़ता
अपनी तदबीर से ही मैं सवालात करता हूँ
नही ला पाया उस्तादों सा पैनापन हुनर में
तुकबंदियों के सहारे पेश ज़ज्बात करता हूँ
शायद इसी लिए लोग मुझे जानने  लगे है
आये रोज़ कोई ना कोई खुरापात करता हूँ
खुदा जाने हो जाते है क्यूं कमजोर बेचैन
मैं तो बारहा मजबूत अपने हालात करता हूँ


शाही अंदाज़ हूँ मैं नवाबों में मिलूँगा



मरने के बाद मैं ख्वाबों में मिलूँगा
ढूँढना गजलों की किताबों में मिलूँगा
कर सको तो करना महसूस मुझको
खुशबू बनकर मैं गुलाबों में मिलूँगा
यूं भीड़ में बेकार तलाश ना कीजिये
शाही अंदाज़  हूँ मैं नवाबों में मिलूँगा
जो असल की भेंट चढ़ा था वो सूद हूँ
मैं साहूकार के हिसाबों में मिलूँगा 
अधुरा हूँ मुकम्मल होकर भी बेचैन
मैं सवालात बनके जवाबों में मिलूँगा

Sunday, 2 October 2011

सच कहूं मैं बहुत बड़े दिलदार से मिला




जो ऑनलाइन पनपा उस प्यार से मिला
आज फेसबुक के अपने इक यार से मिला
मिलते ही बिछा दी धडकने स्वागत में
सच कहूं मैं बहुत बड़े दिलदार से मिला
बहुत दूर थी बनावटीपन से बातें उसकी
मैं साफ़ सुथरे सच्चे व्यवहार से मिला
यही कहूँगा इस मुलाकात को लेकर के
एक कलमकार एक कलाकार से मिला
 लोहा है जिसकी अदाकारी का जहाँ में
बेचैन आज उस लाठर सरकार से मिला

Friday, 30 September 2011

वो मिले तो किस्सा खत्म करूं



सोच सोचकर उम्र क्यूं कम करूं
वो नही मिला तो क्यूं गम करूं
ना हुआ ना सही दीदार उनका
किसलिए भला आँखे नम करूं
सोचता हूँ लिख डालु विरासत
उसके नाम भी कुछ नज्म करूं
हद हो गई फल के इंतजार की
कितने दिन और अब कर्म करूं
अब नही सुहाती इश्क की बातें
वो मिले तो किस्सा खत्म करूं
महबूब के कपड़ो की कंगाली पर
बता तो बेचैन कितनी शर्म करूं

Tuesday, 27 September 2011

कभी गया ही नही कोई आसमां झुकाने



ना आई नींद रात को किसी भी बहाने
रह रह कर तेरी याद आ बैठती सिरहाने
करवटें सैकड़ों बदली दिले-बेताब ने लेकिन
गूंजते रहे कानों में तेरे बोल अनजाने
महोब्बत के सिवा और भी किस्से है कई
क्यूं कुरेदते हो यारों वो जख्म पुराने
ज़ज्बात मुझसे अपने दबाए ना जायेंगे
कभी चल पड़ी जो मौज कोई तुफां उठाने
छोटी से तमन्ना के लिए जान की बाज़ी
क्या सोचकर बनाए खुदा तुमने परवाने
कौन सा काम है जो इंसां कर नही सकता
कभी गया ही नही कोई आसमां झुकाने
बुरा लगता गर उन्हें यूं मेरा करीब आना
ना जायेगा बेचैन किसी का दिल दुखाने

Monday, 26 September 2011

चेहरा कपड़ो की तरह बदलेगा



वही छिपाएगा हकीकत यारों
जिसके मन में चोर रहता हैं
वो रौब दूसरों पर ही झाड़ेगा
ना खुद पे जिसका जोर रहता हैं
नजर सभी पर शक की डालेगा
यकीं जिसका कमजोर रहता हैं
चेहरा कपड़ो की तरह बदलेगा
दिल में जिसके शोर रहता हैं
हाल बेचैन होने पर यारों
कहाँ अपनों पर गौर रहता हैं



Sunday, 18 September 2011

समझ सकता हूँ कजरारी आँखें



अंगूर की बेटी के जो दीवाने नहीं
वो लोग महफ़िल में बुलाने नहीं
कल के टूटते आज ही टूट जाएँ
झूठे रिश्ते नाते हमें निभाने नहीं
जिंदगी का नशा वो क्या जाने
जिसने उठाकर देखें पैमाने नही
समझ सकता हूँ कजरारी आँखें
इनसे बढ़कर कहीं मयखाने नही
इतना तो तय है सितमगर के
साँझ ढलते ही ख्वाब आने नहीं
कल का ही तो वाक्यात है बेचैन
जख्म महोब्बत के पुराने नहीं

खुल गये है टाँके जख्मों के बेचैन


शुक्र है सम्भाल लिया कलम ने मुझे
वरना मार डाला था तेरे गम ने मुझे
बेशक तुझे पाने का जज्बा था मगर
सनकी किया किस्मत ने भ्रम ने मुझे
किसी का हाथ नही बुलंदी के पीछे
यहाँ तक पहुँचाया है मेरे करम मुझे
बेबसी की कहानी मैं ही जानता हूँ
बहुत तडफाया झूठी कसम ने मुझे
खुल गये है टाँके जख्मों के बेचैन
जब भी कुरेदा है तेरी नज्म ने मुझे

Saturday, 17 September 2011

कौन जख्मी ख्यालात करेगा

खुदा जब करामात करेगा
फैंसले हाथों हाथ करेगा
मतलबियों के मोहल्ले में 
कौन गहरे ज़ज्बात करेगा
वो नेता जी है आदमी नही
क्यूं भूखों का साथ करेगा
फिर खोली है जुल्फें उसने
फिर वो दिन को रात करेगा
शादी शुदा से दिल लगाकर
कौन जख्मी ख्यालात करेगा
बड़े से बड़ा चोर भी बेचैन
घर से ही शुरुआत करेगा

Thursday, 15 September 2011

देखना बोलेगी इक रोज़ मेरी किस्मत



उस दिन समझेंगे मेरी यायावरी लोग
बताऊंगा जब दुनिया में कहाँ क्या है
वक्त के थपेड़ों ने पहुँचाया है यहाँ तक
नही जानता विरासत की हवा क्या है
भरोसा है जिनको इश्क-ए-हकीकी में
वही तो बतायेंगे असर-ए-दुआ क्या है
मुझे इतना समझा दो बस मेरे रकीबों 
रश्क रखने से आखिर फायदा क्या है
देखना बोलेगी इक रोज़ मेरी किस्मत
बता दें बेफिक्र  बेचैन तेरी रज़ा क्या है

कोई हाथ मिलाकर दगा दे जायेगा


महोब्बत का दिल में मान रखा कर
आँखों में दर्द की  पहचान रखा कर

कोई हाथ मिलाकर दगा दे जायेगा
इतनी मत जान पहचान रखा कर
दीवानगी को लोग मजाल समझेंगे
हथेली पे ना अपनी जान रखा कर
मतलब परस्ती कहेंगे आपको सभी
ना दोस्तों के याद अहसान रखा कर
हर अच्छे बुरे की समझा देगा वक्त
बस खुले अपने दोनों कान रखा कर 
घर में  कितनी ही विदेशी चीज़ रख
दिल में पर अपने हिंदुस्तान रखा कर
शेर को सवा शेर जूमला है जब तक
तू  ताकत का ना अभिमान रखा कर
बचपन के देखें ख्वाब पूरे होंगे बेचैन
अपनी सोच की ऊँची उड़ान रखा कर

Tuesday, 13 September 2011

सोचता हूँ कई दफा फुर्सत में बैठकर



सोचता हूँ कई दफा फुर्सत में बैठकर
तेरा प्यार तेरी यादें होती ना अगर
फिर किसके सहारे जिंदगी जीते हम
चलता धडकनों के संग किसका गम

आँखों में तस्वीर किसकी बस्ती दोस्तों
मिट जाती आशिकों की हस्ती दोस्तों
होता नही गर कहीं यादों का मौसम
फिर किसके सहारे ..................

हुश्न की भी फिर कोई तारीफ ना करता
यहाँ एक हंसी के लिए ना कोई मचलता
बनाता नही गर किसी को कोई हमदम
फिर किसके सहारे ........................

हर खूबसूरत शै भी बेकार सी लगती
रात भर आँखें ना किसी के लिए जगती
वजूद ढूंढ़ती फिरती फिर अपना शबनम
फिर किसके सहारे ............................

वो दर्द मीठा-मीठा फिर आता कहाँ से
आहों का अहसास हमें सुहाता कहाँ से
बेचैन होकर ना कोई खाता फिर कसम
फिर किसके सहारे .........................



Monday, 12 September 2011

इक सनक सी दिखी बातों में उसकी



वो पास होकर भी मेरे पास नही लगा
न जाने क्यूं दिल को ख़ास नही लगा
बेशक से बढ़ी धडकने देखकर उसको
अपनेपन का पर अहसास नही लगा
इक सनक सी दिखी बातों में उसकी
विचारों में खुला आकाश नही लगा
यूं ही परेशां थे उसके मुरीद और वो
व्यवहार में मुझे विश्वास नही लगा
शातिर नही होते दिमाग वाले बेचैन
जुमला ये वाकई बकवास नही लगा

Sunday, 11 September 2011

मर्दानगी से तर हो तो मैदान में आइये



आम आदमी होने का न मातम मनाइए
मर्दानगी से तर हो तो मैदान में आइये
सच में गर व्यवस्था बदलना चाहते हो
इन्कलाब का हिस्सा आप बन जाइये
यूं ही साफ नही होगी काई तालाब की
मिल बैठकर विचार कोई आप बनाइए
गरूर गर हुआ है सूरज को रोशनी का
आइना आफ़ताब को मिलके  दिखाइए
गुस्सा हर बात पर अच्छा नही बेचैन
थोडा वक्त के सांचे में भी ढल जाइये



Friday, 9 September 2011

इश्क में दोनों का भला हो तो निपट ले



अकेले दिल का मामला हो तो निपट ले
इश्क में दोनों का भला हो तो निपट ले
जिक्र है दिमाग में मचती खलबली का
हिज्र कोई मामूली बला हो तो निपट ले
वही होता है जो भी तकदीर में लिखा है
कभी वार होनी का टला हो तो निपट ले
इश्क तो कर लेता है अब समझोते मगर
हुशन भी तजुर्बों में ढला हो तो निपट ले
इसलिए बेचैन हूँ मंजिल को लेकर दोस्त
मेरे पीछे कोई काफिला हो तो निपट ले

मेरे मित्र अरिहंत जैन के जन्मदिवस पर विशेष व्यापार हो या इश्क मुनाफा मिले बेचैन



खुशियाँ झूमे और आप सदा मुस्कुराये
जन्मदिन पर कोई शुभ संदेश घर आये
रंगीनी मिले बचपन से देखे ख्वाबों को
मन की मुराद हर हाल में पूरी हो जाये
मस्ती के सागर में गोते लगाये जिंदगी
कभी चाहके भी ना गम आपको छू पाए
कोई शख्स या कोई बात आँख में न चुभे
बस आपका भला चाहे वे अपने हो पराये 
व्यापार हो या इश्क मुनाफा मिले बेचैन
दुनिया में आप बेशक कही पर भी जाएँ

चुगली उसके जाने के बाद ना कर


बहाकर आंसू वक्त बर्बाद ना कर
भूलने वाले को तू भी याद ना कर
सौ फीसदी गूंगे बहरों का दौर है
बेकार किसी से फरियाद ना कर
बहाने उसके संजीदगी से लेकर
दर्द नया आये दिन इजाद ना कर
सरे बज्म कह दे जो भी कहना है
चुगली उसके जाने के बाद ना कर
हक मेरे हुनर का मुझे दे दे बेचैन
बेशक मेरी तू कोई इमदाद ना कर

Thursday, 8 September 2011

मेरे बेचैन होने का अफ़सोस न कर




नाम जब खुदा का लेने की सोची
रह रह कर आया ख्याल तुम्हारा
दिलों-दिमाग पर ये कैसा असर है
रूह पर बन है गया जाल तुम्हारा
कालेज के नये माहौल में जाकर
बताओ कैसा बीता साल तुम्हारा
किस कद्र दीवाना हूँ अदाओ का
अजीब सा लगा सवाल तुम्हारा
मेरे बेचैन होने का अफ़सोस न कर
छिपा नही है मुझसे हाल तुम्हारा
 

पढ़े लिखे बेकारों से कहाँ गजल होती है



तेरे इश्क ने बनाया मुझे काम का वरना
पढ़े लिखे बेकारों से कहाँ गजल होती है
तेरी जुदाई ने दी है रंगत मेरे हुनर को
लिखता हूँ जब-जब आँखें सजल होती है
छेड़खानी करने लगता है दिमाग से दिल
इसलिए जवानी में कम ही अक्ल होती है
संस्कारों से लबरेज़ हो सारी ही औलादें
कितनों के नसीब में ऐसी फसल होती है
किसी का भी काम देख लो नजर भर के
झूमती है रूह जब मेहनत सफल होती है
खूबसूरत महबूब और वफा की बात यारों
सुनकर मन में अजीब सी हलचल होती है
बेचैन हूँ मालूम हुआ है यह राज़ जब से
कलियाँ तो गुलशन में रोज़ कत्ल होती है


Wednesday, 7 September 2011

कईयों के लिए तो वनवास है रिश्तेदार


हर शख्स के गले की फांस है रिश्तेदार
बताओ किस किसके खास है रिश्तेदार
मैंने तो आज तक यही देखा है दोस्तों
गरीब आदमियों की आस है रिश्तेदार
नापते है कमबख्त औकात रिश्तों की
बारीकी से देखों बकवास है रिश्तेदार
उम्मीद के जंगले में भटकते है बेचारे
कईयों के लिए तो वनवास है रिश्तेदार
पीढ़ियों के राज सीने में दफन है बेचैन
अपनी पर आये तो राजफास है रिश्तेदार

चिल्ला उठी गरीबों की महोब्बत




सादा सा जिंदगी का राज होता है
फितरत का अक्स मिजाज होता है
कितने ही लगा लो चेहरे पर चेहरे
व्यवहार में छिपा अंदाज़ होता है
चिल्ला उठी गरीबों की महोब्बत
इंटों से बना भी कोई ताज होता है
किसका वास्ता देके समझा रहे हो
बड़ा ही ज़ालिम ये समाज होता है
स्कुल-ए-इश्क में दाखिलाधारी सुनो
हर वक्त हंसता चेहरा दगाबाज़ होता है
सही पेश आती है कई हुश्न की बलाएँ
मनचलों का लुटकर ही इलाज होता है
रुतबे के नाम पर बदतमीज़ ना बनो
आखिर छोटे बड़े का लिहाज़ होता है
बता किसको बेचैन नही करती ये फौज
आदमी नाहक रिश्तों से नाराज़ होता है

Monday, 5 September 2011

जाते ही खत लिखने का करके वादा बेचैन

ठहरी आँखों की कसम दिल की शान चली गई
तू शहर से क्या गई, मेरी तो जान चली गई
दौड़ता है लहू रगों में सिर्फ कहने भर को
जिसे जिंदगी कहते है वो जुबान चली गई
एक बोझ बनकर वो धरती पर रह गया
जमाने में जिस शख्स की पहचान चली गई
तस्वीर के बहाने देकर मेरी तनहाइयो को
देकर सज़ा ए हिज्र का सामन चली गई
पैगाम लेकर आई थी जो मौज साहिल का
उठा कर मेरी जिंदगी में तूफ़ान चली गई
जाते ही खत लिखने का करके वादा बेचैन
खाकर झूठी कसम वो बेइमान चली गई

सीने में छिपा वो राज हूँ में



मानो तो दिल की आवाज़ हूँ मैं
वरना टूटा हुआ  साज़ हूँ मैं
दौड़ कर मुझको गले लगा ले
अपने प्यार का आगाज़ हूँ मैं
बन जाते शाहजहाँ किसी तरह
कहकर तो देखते मुमताज़ हूँ मैं

देखें है जो दोनों ने  मिलकर
उन ख्वाबो की परवाज़ हूँ मैं
देख आईने के आगे बैठकर
तेरा ही नाज़-ओ अंदाज़ हूँ मैं
बेचैन कर देगा खुल गया तो
सीने में छिपा वो राज हूँ में

Sunday, 4 September 2011

यही सीखा उसने बरबाद होकर



बहुत पछताया हो वो सैयाद होकर
जब नही उडा पंछी आज़ाद होकर
जमाना साज़ियो से बावस्ता निकला
हुश्यारी दिखाई उसने उस्ताद होकर
भरोसा भी भरोसे के जितना करो
यही सीखा उसने बरबाद होकर
हंसी से कुछ तो मयस्सर हो शायद
कुछ नही पाओगे नाशाद होकर
मौत के रूबरू हुआ तो कांपने लगा
जो मकतल में रहा था जल्लाद होकर
बेचैन होकर बस मुझे देखने लगा
ना ले सका वो नाम मेरा याद होकर

चुपके-चुपके आहें निकालना सीखा दिया



दर्दे-दिल को हर्फों में ढालना सीखा दिया
शुक्रिया मुर्शिद गम पालना सीखा दिया
टूट जाता वरना, मैं तो दो कदम चलकर
बोझ जिंदगी का संभालना सीखा दिया
किस जुबान से कहूं क्या क्या सीखा दिया
चुटकियो में बुरा वक्त टालना सीखा दिया
परख अपने-बेगानों की बताने के साथ
मुदा सरे बज्म उछालना सीखा दिया
लबों को भी खबर ना हो, कब निकली
चुपके-चुपके आहें निकालना सीखा दिया
फंस जाये गर कभी तन्हाई के हाथों
खामोशी को हथियार डालना सीखा दिया
गजल की बारीकिय समझने के लिए
ज़ज्बात को बेचैन उबलना सीखा दिया 
 

मस्ती इनकी नौकरानी


देखो -देखो तीन तिलंगे
मन कर्म से एकदम चंगे
दुःख चिंता,सोच फ़िक्र के
ये नही लेते बिलकुल पंगे
सत प्रतिशत पवित्र है ये
बोल उठी ये माता गंगे
मस्ती इनकी नौकरानी
ये मनमर्जी के है  पतंगे
चैन की पुडिया है ये बेचैन
बेशक हो शहर में दंगे   

Saturday, 3 September 2011

पहला दुश्मन करीबी होगा



झूठ रास जब आ जाता है
सच को जिंदा खा जाता है
तन्हा बैठ कर रोता है वो
जो जज़्बात दबा जाता है
बेशक चारागर हो कोई
मौत से ना बचा जाता है
खेल तो सब तदबीर का है
तकदीर का तो कहा जाता है
गुलों से पहले बागवां को
खिज़ा का डर खा जाता है
पहला दुश्मन करीबी होगा
नाम जिसका छा जाता है 
जो दुनिया में छा जाता है
कैसा ही लिबास पहन बेचैन
व्यवहार सब बता जाता है 

Friday, 2 September 2011

छोडके कुछेक लोग सब कमजर्फ थे



पल पल जीते जी मारा है खुद को
तब जाके मैदान में उतारा है खुद को
डूबोने वालों ने तो कोई कमी न छोड़ी
बड़ी ही मुश्किल से उभारा है खुद को
छोडके कुछेक लोग सब कमजर्फ थे
जाने कहाँ-कहाँ से गुज़ारा है खुद को
अच्छे बुरे की समझ कोई नही देगा
अपना तो यह इशारा है खुद को
छट गए बेचैन मुश्किलात के बादल
ख़ामोशी से जब पुकारा है खुद को
  

घर की टूटी दिवार की चिंता कर


छोड़ दे शौक घरबार की चिंता कर
नादां ना बन व्यपार की चिंता कर
क्या हासिल हवाई किले बनाने से
घर की टूटी दिवार की चिंता कर
जवानी के भ्रम तो पछतावे देंगे
तू जिंदगी के सार की चिंता कर
खुदगर्जी में उम्र कैसे गुजरेगी
मन में छिपे विचार की चिंता कर
गजल का क्या बन ही जाएगी
अ सुखनवर असआर की चिंता कर
जो रहता है बेचैन तुझे पाने के लिए
कभी तो उस तलबगार की चिंता कर


Wednesday, 31 August 2011

पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ


खूब झूमा अपने ख्वाब के साथ बैठ कर
आज पी भाई साहब के साथ बैठ कर
पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ
सीखा बहुत कुछ नकाब के साथ बैठ कर
बहुत कम लोगो को मालूम था आज
फंस गया सवाल जवाब के साथ बैठ कर
लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे
महसूस किया ये सब गुलाब के साथ बैठ कर
ऐसी कोई तीर मारने वाली बात नही बेचैन
देख लिया हमने जनाब के साथ बैठ कर

Tuesday, 30 August 2011

गरूर-ए-हुश्न भी टूटे और वो मेरे भी हो जाएँ



वो कर ले इकरार तो दुगना हो ईद का मज़ा
समझे मेरा प्यार तो दुगना हो ईद का मज़ा
गमे-बेरुखी का मारा हूँ एक मुदत से दोस्तों
वो हंस दे एक बार तो दुगना हो  ईद का मज़ा
महबूब की इक ना से क्या बीतती है दिल पर
वो करें सोच विचार तो दुगना हो ईद का मज़ा
गरूर-ए-हुश्न भी टूटे और वो मेरे भी हो जाएँ
मगर ना हो शर्मसार तो दुगना हो ईद का मज़ा
कौम-ओ-मजहब को दफन करके सब बेचैन
मनाएं हम त्यौहार तो दुगना हो  ईद का मज़ा




  

Monday, 29 August 2011

सीख गया वो मुकरने का हुनर



जब भी मेरे काम की बात आई
कोई न कोई मुश्किलात आई
करने लगा गरीब छत पक्की
बड़ी ही जोर की बरसात आई
हिज्रमन्दो के हिस्से में आखिर
क्यों बेकसी लेकर रात आई
दानियो का पड़ोसी होकर देखा 
दामन में ना कोई खैरात आई
सीख गया वो मुकरने का हुनर
जब सियासत उसके हाथ आई  
मौत आई तो कहना पड़ा बेचैन
कतई ना रास मुझे हयात आई

Friday, 26 August 2011

सोच-समझके बता बताने वाले






गम कम ना करेंगे जमाने वाले
सोच-समझके बता बताने वाले
रोकर पूछ लेंगे हंस कर टाल देंगे
झूठी तसल्ली देने दिलाने वाले
पीठ पीछे तेरी भी बुराई करते है
तेरे आगे और की चुगली खाने वाले
एक बार खून के आंसू जरुर रोते है
झूठी सिफारिसों से तमगे पाने वाले
पा ही लेते है साहिल को वो लोग
होश्ला कर तूफानों से टकराने वाले
वो धोखे का शिकार होकर बैठते है
दुसरे के पेट पर लात टिकाने वाले
सुलझते ही हालात रंग दिखा देते है
झूठे रिश्ते नाते  बेचैन निभाने वाले


एक दिन खुद से टकराना होगा




जख्म जितना पुराना होगा
रूह से उतना याराना होगा
जुल्फे खोलकर चलोगी तो
तेरा कौन नही दीवाना होगा
देखा आइना तो ख्याल आया 
एक दिन खुद से टकराना होगा
भूलूंगा जब तेरी नशीली आँखें
उस दिन हाथ में पैमाना होगा
रस्सी को जिसने सांप बना दिया
वो सियासत गर्द सयाना होगा
वो ही करेंगे भरोसे से खिलवाड़
घर में जिनका आना जाना होगा
यही है बिगड़ी तबियत का इलाज
 शौक पर बेचैन काबू पाना होगा

Thursday, 25 August 2011

मुदत से जल रहा हूँ परवानों की तरह


आया न करो पेश यूं मेहमानों की तरह
तुझे बसाया है दिल में अरमानों की तरह
इसे शौक समझिये या कहिये बेबसी
मुदत से जल रहा हूँ परवानों की तरह
अ हुश्ने- बेपरवाह क्या खबर है तुझको
नशा है तेरी आँखों में पैमानों की तरह
पल में दूर हो जायेगा अँधेरा जिंदगी का
चिरागे-उल्फत जलाओ दीवानों की तरह
जवानी गर चाहे तो क्या नही हो सकता
हौसला करके देखो तूफानों की तरह  
जिंदगी से तो खैर नामुमकिन थी वफा
मौत ने भी पेश आई बेजुबानो की तरह
क्या पता आंसू तेरे कोई खरीद ले बेचैन
कभी सज़ा तो सही पलकें दुकानों की तरह 

Tuesday, 23 August 2011

बाल कविता लिखने का प्रयास किया था ये बन गई दोस्तों अगर मैं कोई प्याऊ होता



मेरी खाट नीचे भी बिलाऊ होता
काश मैं भी किसे का ताऊ होता
डरते मेरे त भी छोटे-छोटे बालक
शक्ल का अगर मैं हाऊ होता
पीता दूध जित भी फसता मेरे
अगर मैं सचमुच म्याऊ होता
आता काम गर्मियों में प्यासों के
दोस्तों अगर मैं कोई प्याऊ होता
सरकार के पास बेचैन बात खातिर
कोए तो गधा काम चलाऊ होता



 

आत्मा ना गिरवी धरो सरकार के नुमायेंदो



बेशर्मी भी इतना न करो सरकार के नुमायेंदो
शर्म बची है तो डूब मरो सरकार के नुमायेंदो
लोकपाल पर पूरा देश हाय तौबा मचा रहा है
आत्मा ना गिरवी धरो सरकार के नुमायेंदो
फूटा जो घडा पाप का तो बर्बाद हो जाओगे
माल ना हराम का चरो सरकार के नुमायेंदो
देश के खातिर अन्ना ने इक सपना देखा है
उस सपने में रंग भरो सरकार के नुमायेंदो
चाहते हो अगर देश में कोई बेचैन ना हो
गरीबों के दुःख हरो सरकार के नुमायेंदो

Sunday, 21 August 2011

देखे कितने नेतागण




कीड़े पड़कर मरेंगे
सड़-सड़ कर मरेंगे
देश लूटने वालो के
बच्चे लड़कर मरेंगे
सच के सामने झूठे
नाक रगड़ कर मरेंगे 
देखे कितने नेतागण
शर्म में गडकर मरेंगे
सब गालियाँ भ्र्स्तों को
बेचैन जी जड़कर मरेंगे

Saturday, 20 August 2011

केंसर बन गया रिश्प्त्खोरी का जलपान


मदद कर खुदा इमदाद कर भगवान
है परिवर्तन के दौर में मेरा हिंदुस्तान
अगस्त क्रांति जाने क्या रंग लाएगी
आज अटकी हुई है हर किसी की जान
वक्त की अदालत में जारी है मुकदमा
जीतेगा अन्ना या सियासत के शैतान
काश शुरू दिन से सम्भल जाता देश
केंसर बन गया रिश्प्त्खोरी का जलपान
जायज़ है आम आदमी का बेचैन होना
छू रही है महंगाई आये दिन आसमान

ताकि ना मजे लुटे जेल में कसाब कोई


मुझे गलत समझने वालो दो जवाब कोई
न तो मेरे औलाद है ना घरेलू ख्वाब कोई
चाहता हूँ कानून आम जनता के हक में
ताकि ना मजे लुटे जेल में कसाब  कोई
भ्रसटाचार की बदबू को रोकने के लिए
जरूरी है आगे आये बनके गुलाब कोई
तजुर्बो की बदौलत उतरी है  बालों में चांदी
मैं क्यों लगाऊ अब बालों में खिजाब कोई
जो कहना  है मुह पर ही कहता हूँ बेचैन
मैं  बातों को नही पहनाता नकाब कोई

Friday, 19 August 2011

मांस नोचने में अब छा रहे है लोग



आँखों देखी मक्खी खा रहे है लोग
जान बूझके गर्क में जा रहे है लोग
शर्म-लिहाज़ पर बहस करने वाले
बेशर्मी का बिगुल बजा रहे है लोग
हमाम में नंगे होने की बातें छोडो
अब तो खुले में ही नहा रहे है लोग
चील और गिद्द भी हुवे खौफजदा है
मांस नोचने में अब छा रहे है लोग
राम नाम जपना पराया मॉल अपना
गीत एक ही सूर में गा रहे है लोग
कर ली है रिश्तेदारी झूठ से बेचैन
सच्चाई से भी जी चुरा रहे है लोग

अब जो कहते है ये जंग नही वे उल्लू के पट्ठे है



आज जो अन्ना के संग नही है वे उल्लू के पट्ठे है
जिनमे देशभक्ति का रंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
भ्रसटाचार नही मिट सकता सोचने वालों सुन लो
जो इस बदलाव से दंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
दुनिया भर में धूम मची है अन्ना जी के नाम की
सुन फड़का जिनका अंग नही वे उल्लू के पट्ठे है
रिस्पतखोरो के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर
जिसके भी मन में उंमग नही वे उल्लू के पट्ठे है
यह सौ फीसदी आज़ादी की दूसरी लड़ाई है बेचैन
अब जो कहते है ये जंग नही वे उल्लू के पट्ठे है

Tuesday, 9 August 2011

उन दिनों तुम अपने ज़ज्बात बदल सकते थे



तुमने चाहा ही नही हालात बदल सकते थे
अपनी बर्बादी की हम हर बात बदल सकते थे

आदमी कैसा हूँ मैं,मुझको समझते तो सही
मेरे बारे में तेरे ख्यालात बदल सकते थे
मेरे माथे पे मेरी कौम नही लिख रखी
साथ तुम देते हो हम ज़ात बदल सकते थे
जीना मुश्किल था अगर साथ इस दुनिया में
मर के हम तुम अपनी कायनात बदल सकते थे
मुझ पर इलज़ाम लगे जब जमाने भर के
उन दिनों तुम अपने ज़ज्बात बदल सकते थे
माफ़ हम करके तुम्हे, सीने से लगा लेते
पास आकर अपने वाक्यात बदल सकते थे
अपने बेचैन से तुम बात करते तो सही
हम तेरी आँखों की बरसात बदल सकते थे

तेरे गेसू मेरी किस्मत दोनों उलझे-उलझे है


मत पूछो  किसलिए आबे-जम पर लिखता हूँ
इक गजल रोजाना अपने गम पर लिखता हूँ
एक रोज़ तो जान जाऊंगा खारापन अश्को का
यही सोचकर मैं चश्मे-पुरनम पर लिखता हूँ
तेरे गेसू मेरी किस्मत दोनों उलझे-उलझे है
मैं इसीलिए तो जुल्फे- बरहम पर लिखता हूँ
दिल में सुलगे शोलो की रंजिस का राज यही
रोज़ सुबह अशआर मैं शबनम पर लिखता हूँ
ना सीखा ना फितरत में चोरी शामिल है बेचैन
जो भी लिखना होता है अपने दम पर लिखता हूँ

क्या खिला दिया साजन ने निखर गये हो



सरगोशी हो रही है तुम जिधर गये हो
क्या खिला दिया साजन ने निखर गये हो
कुछ नही हासिल,वक्त की दलील देने से
क्यू  नही मानते जुबां से मुकर गया हो
घुंघट की आड़ में रहकर चंद रोज़ सांवली
हुश्न की कसोटी पर खरे उतर गये हो
चाल में बर्क है तो तब्बसुम है लबो पर
निकाह के बाद अंदाजों से भर गये हो
पहरों बीतते थे जिन हमनशीनो के साथ
उनके भी घर मुलाकाते मुख्तसर गये हो
हर कहानी का अंजाम एक जैसा नही होता
किसलिए शहर में हुवे हादसे से डर गये हो
छोड़ दिया बेचैन उसने देखना कनखियों से
जब से तुम इलज़ाम अपने सिर धर गये हो

Monday, 8 August 2011

लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे


खूब झूमा अपने ख्वाब के साथ बैठ कर
आज पी भाई साहब के साथ बैठ कर
पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ
सीखा बहुत कुछ नकाब के साथ बैठ कर
बहुत कम लोगो को मालूम था आज
फंस गया सवाल जवाब के साथ बैठ कर
लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे
महसूस किया ये सब गुलाब के साथ बैठ कर
ऐसी कोई तीर मारने वाली बात नही बेचैन
देख लिया हमने जनाब के साथ बैठ कर

खूब झूमा अपने ख्वाब के साथ बैठ कर
आज पी भाई साहब के साथ बैठ कर
पैग पे पैग लिए मगर नशा नही हुआ
सीखा बहुत कुछ नकाब के साथ बैठ कर
बहुत कम लोगो को मालूम था आज
फंस गया सवाल जवाब के साथ बैठ कर
लाजिम था पीने के बाद खुशबू आये मुझमे
महसूस किया ये सब गुलाब के साथ बैठ कर
ऐसी कोई तीर मारने वाली बात नही बेचैन
देख लिया हमने जनाब के साथ बैठ कर

हो जाती बरसात तो ना सुलगता बेचैन



कौन बैठेगा भला आकर मुझ ठूठ के नीचे
ना छाया देता हूँ ना असर बहारो का है
गला घोंट दू यादो का नया घर बसा लू
मुझसे ना होगा ये काम तो गदारो का है
वो तो गम की कैद में हूँ वरना बता देता
क्या मतलब आजकल तेरे इशारो का है
हर काम में दिखाते है जो लोग कलाकारी
आज जमाना यारो उन कलाकारों का है
हो जाती बरसात तो ना सुलगता बेचैन
दिल जलाने में हाथ हल्की फुहारों का है

Sunday, 7 August 2011

मित्रता दिवस पर जब यादों के जंगल में गया तो ये रचना तैयार हुई



कुछ साले कुछ कुते कुछ कमीने याद आये
दोस्ती के नाम पर कुछ नगीने याद आये
बयाँ नही कर सकता मैं अहसास जिनका
मस्ती बिखेरते मुझे वो महीने याद आये
खुदा कितना साथ देता है नाखुदाओ का
जब महोब्बत के हमको सफिने याद आये
इश्क में उन दिनों की मेहनत तौबा तौबा
कैसे -कैसे निकले वो पसीने याद आये
सर चढ़कर बोलती थी नौजवानी मगर
बदमाशियो के हमको करीने याद आये
जिक्र मयकशी का छिड़ा तो सुन बेचैन
कोलिज़ में बैठकर जाम पीने याद आये

जब से हुवे बदतमीज़ थोडा



हम मुद्तो रहे अपनी हद में
ना बढ़ पाए रुतबा-ए- कद में
जब से हुवे बदतमीज़  थोडा
नाम आ गया बडो की जद में
आज कुर्सी की बात ना करो
अजीब सी ताकत है पद में
खूब पछताए इक उम्र के बाद
जो चूर थे कभी अपने मद में
राज बेचैन होने का जान जाओगे
 झांक कर देखो  मुझ निखद में



Saturday, 6 August 2011

ऊँगली पर गिनो जब यार अपने बेचैन



ये महोब्बत ये अपनापं बरकरार रखना
दोस्त सदा दिल में यूही प्यार रखना
आभागा हूँ मुझपे आ सकती है मुश्किल
देने को मेरा साथ खुद को तैयार रखना
सच कहू तो ज़माना मेरे पीछे पड़ा है
चापलूसों से खुद को खबरदार रखना
खबर देश प्रदेश की लगती रहेगी
घर में कोई बांधकर अखबार रखना
सुना है देश छोड़ कर जा रहे हो तुम
हो सके तो ख्याल मेरा उस पार रखना
ऊँगली पर गिनो जब यार अपने बेचैन
हो सके तो नाम मेरा शुमार रखना

कुछ शेर दोस्ती के लिए

सिवाय आपसे  जैसे यारों के मेरे पास क्या है
आपने ही तो बताया यारी का अहसास क्या है
खून के  रिश्ते तो आज ज़हर उगलने लगे है
कहो दोस्ती से बढ़कर रिश्ता  खास क्या है
...........................................................
जो करते नही खिलवाड़ दोस्ती के साथ
उन यारो को लेता हूँ संजीदगी के साथ
धोखा फरेब और मक्कारी के युग में  
कैसे कर लू दोस्ती हर किसी के साथ
............................................................
धडकनों को आँखों को, ना किसी का इंतज़ार हुआ
उसकी बे-वफाई के बाद, ना कोई मेरा यार हुआ
चाह कर भी ना बन सका मन का मीत कोई  
कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ
.............................................................कुछ शेर दोस्ती के लिए 
बनके लहू जो यार रगों में दौड़ते है
वो जिंदगी में इक मकसद जोड़ते है
शक में डूब जाती है उनकी हर बात  
जो लोग दोस्ती में भरोसा तोड़ते है



कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ

धडकनों को आँखों को, ना किसी का इंतज़ार हुआ
उसकी बे-वफाई के बाद, ना कोई मेरा यार हुआ
चाह कर भी ना बन सका मन का मीत कोई
कहने को तो कई चेहरों में उसका दीदार हुआ

Friday, 5 August 2011

सफर की शुरुआत ही क्यू होती है



घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
बात में कितने तौला  मोती है
सोच समझ कर बताओ यारो
उमर ख़ुशी की किसलिए छोटी है
ता-उमर चलके भी दो गज जमी
सफर की शुरुआत ही क्यू होती है
उसकी यादें ना हुई गजब हो गया
आते ही मन का चैन क्यू खोती है
हजारों रिश्तो के आगे भी बेचैन
माँ किसलिए नम्बर वन होती है

उम्र भर का दे जाते है इंतजार कुछ लोग


क्यूं होते है इस कदर होशियार कुछ लोग
समझ लेते है दूसरो को बेकार कुछ लोग
कामयाबी सबका जन्मसिद्ध अधिकार है
क्यूं नही करते है सोच विचार कुछ लोग
जब देखो फूलों से दिल लगाते फिरते है
क्यूं नही चाहते उल्फत खार से कुछ लोग
मैंने देखा है औरों पर तंज़ कसने वालों को
नही करते है खुद को शर्मसार कुछ लोग
खाकर झूठी-सच्ची कसमे इश्क में अक्सर
उम्र भर का दे जाते है इंतजार कुछ लोग
जिनका मजबूरी में बोझ उठाना पड़ता है
किसलिए होते है रिश्तों पर भार कुछ लोग
नही समझ पाया हूँ मैं आज तक बेचैन
क्यूं करते है मतलब से व्यवहार कुछ लोग

Tuesday, 2 August 2011

धडकन सा मगर तू मेरी जान ही रहा

मकी ना बना दिल का मेहमान ही रहा
दोस्त जिंदगी पर सदा अहसान ही रहा
टपकता रहा ता-उम्र लहू मेरी आँखों से
लेकिन तू तमाशाइओ सा हैरान ही रहा
बेशक चढ़ गया हो परवान दुश्मनी का
धडकन सा मगर तू मेरी जान ही रहा
ना रास आया जमीं पर जब कोई नजारा
दूर तक नजर दौड़ाने को आसमान ही रहा
कुछ यूं मिला सिला इंतजार का हमको
मरते दम तक आँखों में तूफ़ान ही रहा
जान गया जब बागवा बे-वफाई मौसम की
बहारो के आने पर भी परेशान ही रहा
बेचैन रुत की मानिंद दुनिया बदल गई
अपना राहे-वफा पर चलना ईमान ही रहा