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Thursday, 8 May 2014
Tuesday, 6 May 2014
किसने कहा बेटियां पराई होती है
ये तो माँ-बाप की परछाई होती है
पीड़ा समझती है हर एक रिश्ते की
बेटियां असल हातिमताई होती है
दहलीज जो भी कंवारी रह जाती है
उस आँगन में दर्ज़नो बुराई होती है
वही रखेगा बेटियों पर गलत निगाहें
जिसकी सोच में गंदगी समाई होती है
फेरो के साथ ही हकदार बदल जाते है
कब जिंदगी की बेटी मल्काइन होती है
कोख में मारने वालो सुनो बेटियां तो
नसीब अपने साथ लेकर आई होती है
दुनिया जिसे इज़्ज़त का नाम देती है
बेचैन वो बेटियो से ही कमाई होती है
ये तो माँ-बाप की परछाई होती है
पीड़ा समझती है हर एक रिश्ते की
बेटियां असल हातिमताई होती है
दहलीज जो भी कंवारी रह जाती है
उस आँगन में दर्ज़नो बुराई होती है
वही रखेगा बेटियों पर गलत निगाहें
जिसकी सोच में गंदगी समाई होती है
फेरो के साथ ही हकदार बदल जाते है
कब जिंदगी की बेटी मल्काइन होती है
कोख में मारने वालो सुनो बेटियां तो
नसीब अपने साथ लेकर आई होती है
दुनिया जिसे इज़्ज़त का नाम देती है
बेचैन वो बेटियो से ही कमाई होती है
Sunday, 27 April 2014
शर्म और लिहाज़ से जितना भरा होगा
व्यवहार में वो सख्स उतना खरा होगा
इक दफा रोज निहारता है वो पैर खुद के
इन पर जरूर किसी ने सर धरा होगा
अहसास में जुदाई मायने नही रखती
देख लो जिक्र छेड़कर जख्म हरा होगा
तस्वीरें यार देगी उसी की आँख को ठंडक
आंसू बनकर जिसका भी दर्द झरा होगा
दोगलेपन से वही पेश आएगा बेचैन
जिस भी इंसान का जमीर मरा होगा
व्यवहार में वो सख्स उतना खरा होगा
इक दफा रोज निहारता है वो पैर खुद के
इन पर जरूर किसी ने सर धरा होगा
अहसास में जुदाई मायने नही रखती
देख लो जिक्र छेड़कर जख्म हरा होगा
तस्वीरें यार देगी उसी की आँख को ठंडक
आंसू बनकर जिसका भी दर्द झरा होगा
दोगलेपन से वही पेश आएगा बेचैन
जिस भी इंसान का जमीर मरा होगा
यारब उसी की सोच थर्ड क्लास निकली वरना
हमने उसे कभी कलेक्टर से कम नही समझा
समझकर छोड़ा फिर उसको बेईमान सोच ने
हमदम को कभी जिसने हमदम नही समझा
क्या ख़ाक सुलझाएगा वो जमाने के मसलो को
जिस सख्स ने कभी हालात का खम नही समझा
रिश्तो के मुआमले में वक्त ने ठग लिया उसको
जिसने दूसरो की वफ़ा में कभी दम नही समझा
माँ बाप तक खो चुका हूँ खोने के मामले में बेचैन
इसलिए महबूब के गम को कभी गम नही समझा
हमने उसे कभी कलेक्टर से कम नही समझा
समझकर छोड़ा फिर उसको बेईमान सोच ने
हमदम को कभी जिसने हमदम नही समझा
क्या ख़ाक सुलझाएगा वो जमाने के मसलो को
जिस सख्स ने कभी हालात का खम नही समझा
रिश्तो के मुआमले में वक्त ने ठग लिया उसको
जिसने दूसरो की वफ़ा में कभी दम नही समझा
माँ बाप तक खो चुका हूँ खोने के मामले में बेचैन
इसलिए महबूब के गम को कभी गम नही समझा
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